Monday, 20 April 2015

पांच घण्टे की दिल्ली और वो गुजरातन

हैलो.. प्रियम......... !!!
मैंने पीछे पलट कर देखा। वो मुझे गले लगाने को आगे बढ़ रही थी। मैं फ्रेंच स्टाइल मोड़ में आकर खुद को थोडा टेढ़ा मोड़ा और उसे मुझे गले लगा लेने दिया। पांच छह सेकेंड के बाद हमारी नज़रें प्लेटफॉर्म पर खड़ी भीड़ पर थी जो एकटक हमें घूरे पड़ी थी।
मैंने झेंपते हुए एक बार फिर उसे टाटा बाय कहा। और वड़ोदरा के प्लेटफॉर्म सात से एक की ओर बढ़ता गया। फिर न ही मैं पलटने की हिम्मत में था न वो मुझे दोबारा आवाज़ देने की।

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मुझे शुक्रवार को अर्जेंटली आगरा जाना पड़ा। कभी कभी आप मजबूर होते हैं पर कोई और चारा न होते देख उस मजबूरी में ही दिलचस्पी ले बैठते हैं। अगस्त क्रान्ति ने धोखा नहीं दिया। वोटिंग कंफर्म हो गई और मैं सुबह मथुरा और मथुरा से टैक्सी से सवा घण्टे में आगरा पहुंचा। दोपहर को ऑफिस और फिर अगले दिन के इतवार की बलि देकर मुझे सुबह मथुरा से गोल्डन टैम्पल पकड़नी थी। मथुरा पहुंचते लेट हो गए थे। गोल्डन जा चुकी थी। मुझे एकाएक क्या सूझा कि क्यों न दिल्ली चला जाए और निजामुद्दीन से गरीब रथ पकड़ कर सूरत निकल जाएंगे।
मैंने राहुल को फोन किया। हम जुमा जुमा दो साल बाद मिल रहे थे। मैंने मथुरा से महाकौशल एक्स पकड़ी और डेढ़ बजे निजामुद्दीन उतरा। सवा तीन पर गरीब रथ थी। मैं ढंग से दिल्ली घूमना चाहता था। कि अब आ ही गए हैं तो ....
हमनें इंद्रप्रस्थ से मैट्रो ली। राजीव चौक होते हुए सेंट्रल सेक्रेटेरियट और फिर पार्लियामेंट, प्रेजिडेंट हाउस, इंडिया गेट और फिर वापिस सेन्ट्रल सेक्रेटेरियट। मेरा चिकन खाने का मन हुआ तो हम चांदनी चौक निकल गए। सिंघी के यहां चिकन खाया और थोड़ी बहुत पी ली। दिन में पीने के बाद आप कुछ ज्यादा एनर्जेटिक हो जाते हो। बहरहाल।
चांदनी चौक से हम वापस इंद्रप्रस्थ आए और फिर निजामुद्दीन गए। पता चला कि गरीब रथ तो कब का छूट गई। पश्चिम एक्स निजामुद्दीन रूकती ही नहीं। अगली ट्रेन थी रात ग्यारह बजे और मेरी जान निकली जा रही थी। मैंने कोटा होकर ट्रेन बदलते हुए जाने का विचार बनाया और मेवाड़ एक्स धर ली। एक अपर बर्थ खाली देख मैं उसकी ओर लपका। नींद लग गई। जो सवाई माधोपुर निकलने के बाद खुली। दो बजे मैं कोटा पहुंचा। और फिर वहां से रात चार बजे जम्मूतवी-जामनगर पकड़ी। मैंने टीटी की ओर पांच सौ का पत्ता उसके कुछ न नुकुर करने से पहले ही पकड़ा दिया। मुझे बर्थ मिली एस12 में।
गेट में ब्लैक कैपरी और सफ़ेद टॉप पर एक लड़की खडी थी। मैं उसे लगभग नज़रअंदाज़ करता हुआ सीट पर जाकर लगभग बेहोश हो गया। सुबह नागदा आया। और मेरी नींद खुली। वो मेरे सामने की ही मिडिल बर्थ में लेटी हुई मुझे देखकर मुस्कुरा रही थी। मैंने उसे डर्टी लुक दिया। वाज़िब बात है आप सोकर उठो और कोई अजनबी पर सुन्दर सी कन्या आपको देखकर मुस्कुराती हुई मिले तो कैसा लगेगा?
सौरी?
नथिंग(वो फिर दांत निपोरने लगी)
ओके
मैंने बाथरूम जाकर अपना हुलिया ठीक किया। सीट पर चाय मंगाई। थोड़ी देर बाद उसनें मुझे लेज़ ऑफर की।
थैंक्स (मैंने मना कर दिया)
नहीं प्लीज़ एक ही ले लीजिए
मैं चिप्स नहीं खाता (मैंने फॉर्मेलिटी करना बेहतर समझा)
अब उसनें मुझे डर्टी लुक दिया
इतना ईगो ठीक नहीं प्रियम (मैंने खुद को समझाया)
कहां जा रही हो आप?
जी मैं आणंद, और आप?
मैं सूरत, वड़ोदरा से चेंज करूंगा
मैंने गौर किया कि बर्थ में वो हर किसी से बिंदास बात कर रही थी। कभी वो दरवाज़े पर खड़ी हो जाती तो कभी कुछ तो कभी कुछ। रतलाम में मै कुछ लेने उतरा तो उसनें फिर स्माइल दी। जवाब में उसके लिए मैंने पोहे ला दिए।
ट्रेन चली और हमारी पोहा टॉक शुरू हो चुकी थी।
क्या करती हो आप?
मैं हाउसवाइफ हूं, अभी हबी के साथ दिल्ली सैटल हुई हूं। आणंद मेरा ससुराल है और मायका अहमदाबाद में है।
ओके। बट आप मैरिड लगती नहीं हो।
(किसी लड़की को और क्या चाहिए इसे सुनने के सिवाय। वो मुस्कुराई।)
और हसबैंड?
वो दिल्ली में एक सौफ्टवेयर कंपनी में हैं। हम लोग दिल्ली में सैटल हुए हैं और मॉम और डैड इन लॉज़ वहीँ आणंद में रहते हैं।
गुजराती?
नहीं। मैं एमपी से हूं।
फिर वो मुझसे मेरे बारे में पूछने लगी।
अपने हसबैंड की फोटो और महज़ तीन महीने पहले की फ़ोटोस दिखाने लग गई।
उसनें अपने पति की तस्वीर दिखाई(जो शक्ल से काफी गुस्सैल और अनरोमैन्टिक प्रतीत होता था)
ये मेरी सिस, ब्रो, और ये मेरी मम्मा ये पापा। और ये फादर इन लॉ। ये मेरी सासु मां। और ये मेरी सासु मां के बॉयफ्रेंड।
सासु मां के बॉयफ्रैंड???
हां
मेरे हसबैंड तो कहते हैं तू भी एक बॉयफ्रैंड बना ही ले।
क्या बकवास है?
रियली! इनफैक्ट उनकी भी कई गर्लफ्रेंड हैं।
मैं सुनकर सोचता रह गया कि कैसे रियेक्ट करना बेहतर होगा।
आपको कोई प्रॉब्लम नहीं होती??
नहीं। क्योंकि मैं शांति चाहती हूं। जो जैसा है एडजस्ट करना ही होगा। और मैं खुश हूं। बहुत खुश। (अब वो मुझसे ढंग से आँखें तक नहीं मिला पा रही थी।)
मैंने उसे थोडा कम्फर्टेबल करते हुए उसकी हॉबीज़ और खूबसूरती के राज़ पर चर्चा छेड़नी सही समझी। वो फिर बिंदास मोड़ में लौट आई। उसनें बताया कि वो सुबह पांच बजे उठकर उनका ब्रेकफास्ट और लांच तैयार करती है और उनके ऑफिस जाने के बाद का समय अपनी पड़ोसन के साथ बतियाने और टीवी के सामने गुजारती है। (उसनें उस पड़ोस की फोटो भी दिखाई, जो लाल साडी में एक भद्दी महिला से अधिक नहीं लग रही थी)
मुझे तो दर्शन के इनसे भी अफेयर होने के चांसेज लगते हैं। पहले वो इन्हें दर्शन जी कहती थी और अब केवल दर्शन, हुह।
(मेरा मन था कि उससे पूछ ही लूँ कि लड़की, तू अपने मन को इतना बेवकूफ भला कैसे बना लेती है? बता कहां से लाती है इतना टॉलरेंस!)
आप वाट्सएप यूज़ करते हो?
हां करता हूं।
उसनें मेरा नंबर मांगा। मैंने फौरन दे दिया।
आसपास बैठे लोग अब मुझे बुरी तरह घूर रहे थे। वे मुझे उसके साथ बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे। मुझे मज़ा आ रहा था उनके पीले पड़े चेहरों को देखकर। मर्दों के लिए इससे अच्छा क्या होगा कि डब्बे की सबसे खूबसूरत लड़की केवल उसी से बतिया रही है और बाकी सब देखे जा रहे हों।
अचानक मेरी नज़रें उसके डार्क सर्कल्स पर गईं। (हालांकि जानी तो नहीं चाहिए)
ये कैसे? (मैंने उसकी आँखों के तरफ इशारा करते हुए कहा।)
तुम साफी पिया करो।
वो समझ गई थी कि मैं काफी कुछ समझ चुका हूं। एनिवेज़।
उसनें बताना शुरू किया कि वे दोनों उतने करीब भी नहीं हैं। उसे अब एक्साइटमेंट होनी भी बन्द हो गई है और उसनें उसी में खुश रहना शुरू कर दिया है।
तुम वर्जिन हो? (उसनें पूछा)
नो पर्सनल क्वेश्चन प्लीज़। मैं अभी उतना कम्फर्टेबल नहीं हूं।
इट्स ओके।
वैसे लगते नहीं हो। ( उसनें फिर खींसे निपोर दीं)
मैंने कोई रियेक्ट नहीं किया।
मैंने देखा कि इस बीच उसके पति का एक भी फोन उसे नहीं आया था। हां अलबत्ता उसके कजिन्स, भाई और सास ससुर कई कई बार उसे याद कर चुके थे।
गोधरा आया तो उसनें इशारों में मुझे वाश बेसिन तक आने को कहा।
फेस वाश करोगे? (उसनें मुंह धोते हुए कहा)
वो बाजू वाला बंदा न इतना हरामी है, कल पता है बात ही बात में उसनें दो बार मेरी थाइस टच कीं। मेरे ऑब्जेक्शन के बाद वो एकदम चुप हो गया है। पता है वो हमें घूर रहा था।
डोंट वरी। (मैंने मुंह धोते हुए कहा)
कुछ देर हम मुंह बंद करके दरवाज़े पर साथ खड़े रहे।
तुम्हारे हसबैंड या तो काफी शाई हैं या फिर बाहर ही सारा वक़्त खर्च आते हैं। तुम समझ रही हो न? (मैंने उससे आँखें मिलाते हुए  कहा)
ह्म्म्म, आई नो। पर मैं क्या करूं?
ट्राई ट्राई एन्ड ट्राई।
फिर भी कुछ न हासिल हुआ तो?
तो फिर और कोशिश करो उसे या उसके लिए खुद को बदलने की। आफ्टरऑल वो तुम्हारा है।
हां, पर मैं जानती हूं कि फिर भी कुछ भी नहीं बदलेगा।
तो फिर तुम्हे आज़ादी है अपनी ज़िन्दगी अपने मुआफिक जीने की। वो सब करने की जो जायज़ है और वो सब कुछ छिपते हुए करने की भी जो नाजायज़ है।
वो एकदम चुप थी। वड़ोदरा आ रहा था।
हम दरवाज़े से हटे और मैं जाकर अपना बैग लिया। ट्रेन प्लेटफॉर्म में लग रही थी। मैंने उसे बाय कहा। उसनें स्माइल दी और हांथ आगे बढ़ाया।
मैं हांथ मिलाकर आगे बढ़ गया। मैं मन ही मन सोच रहा था कि जब ये गुजरातन दिल्ली वापस जाए तो उसे सब कुछ बदला बदला मिले।

Friday, 3 April 2015

अफकोर्स, च्वाइस इज़ योर्स

'माय च्वाइस' जैसे मुद्दों पर चर्चाओं का बाज़ार गर्म है। इसे पूर्व में दीपिका पादुकोण पर फिल्माए गए छैल-छबीले नृत्यों से भी जोड़कर देखना सही नहीं है। वे डायरेक्टर च्वाइस थे, और आज जो वे कह रही हैं- वे दीपिका की च्वाइस है। अगर उन फिल्मी नृत्यों पर भी दीपिका की च्वाइस बरकरार रहती तो क्या वे बोल्ड एंड ग्लैमरस दीपिका पादुकोण कहला पातीं? बहरहाल।

माय च्वाइस के साथ साथ चर्चा महिलाओं के अंतर्वस्त्रों पर भी खुलकर होने लगी है। कम से कम मुझे तो इसपर किसी को बोलता देख भी शर्म आ जाती है। विषय भी क्या- ब्रा ? संभव है कुछ लोग इसपर खुलकर चर्चा कर सकते हों, उन्हें इजाज़त मिलनी चाहिए। उन्हें ब्रा पर खुलकर बहस में हिस्सा लेना ही चाहिए। आप उन्हें भला कब तक और रोक सकेंगे ? गलती मर्दों की ही है, हमनें न जाने किस डर से, पर समाज को रोककर रखा।

औरतें आज आर्थिक और सामजिक रूप से मर्दों को टक्कर दे रही हैं। उनके हांथ में तालीम है, उन्होंने इतिहास से वो सब कुछ जाना, जो हमारे यहाँ होता रहा। आज ठीक उसी तरह, वो आपसे बातें करना चाहती हैं। इसीलिए दीपिका का कहा जायज़ है कि, किसी भी महिला को पूरी आज़ादी है, विवाहपूर्व या विवाहोत्तर, असीमित मर्दों के साथ शारीरिक संबंध बनाने की। पर पहले पुरुषों से विवाहोत्तर संबंध निभाने की ज़िद खत्म करनी होगी। पहले यह भी तय कीजिए कि पति, बच्चों और सास ससुर को लेकर आपकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं होगी। कुल मिलाकर, परिवार प्रणाली ख़त्म कर दीजिए। फिर आपको पूरी आज़ादी है। चाहे जो करने की, असंख्य शारीरिक संबंध बनाने की। और मन मुआफिक साथी बदलने की भी। और फिर भी अगर कोई समाज आपको रोके तो वो समाज बुज़दिल है।  कोई मर्द ऐसा करने से रोके तो वो भी नामर्द है। पर पहले तय तो आपको करना होगा। आखिर हम इतने बुरे जो ठहरे। 

Sunday, 29 March 2015

कॉलेज सीनियर एन्ड अ लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप

हे यू नो व्हाट? वो बोहत केयरिंग हैं। रोज़ मुझसे पूछते हैं, खाना खाई? पढ़ाई कैसी चल रही है? डाइट पे ध्यान दो। एट्सेक्ट्रा। हमारे पूरे बैच में केवल मुझसे ही बातें करते हैं।
हम्म
वो न बिलकुल तुम्हारी ही तरह हैं। क्यूट एन्ड केयरिंग। कभी कभी उन्हें देखकर तो मुझे तुम्हारी याद आ जाती है।
मेरी तरह हैं?
मेरा वो मतलब नहीं था पागल.. !
वो तुम्हारे सीनियर हैं।
हां तो?
तो यह कि वो अपने बैच का एकमात्र सिंगल बन्दा भी है।
व्हाट डू यू मीन?
कुछ नहीं, बस यही कि इन्ही चेप हरकतों की वजह से वो सिंगल रह गया। एनिवेज़। मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं।
अब तुम पज़ेसिव हो रहे हो
मैं नहीं हो रहा हूं। खैर, छोडो।
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Monday, 23 March 2015

फ्रैंडशिप

फ्रैंड्स ?
हां, श्योर !
मैं मज़ाक नहीं कर रहा हूं ...
हम ऑलरेडी फ्रैंड्स हैं पागल,
कैसे ?
बस जैसे सब होते हैं वैसे वाले और कैसे..
नहीं वैसे वाले फ्रैंड्स नहीं, सीरियस वाली
फ्रैंडशिप चाहिए मुझे
ठीक है, फ्रैंड्स...फ्रैंड्स ... फ्रैंड्स....., अब खुश ?
ये क्या था?
तीन बार बोलने से हम हमेशा हमेशा के लिए
दोस्त बन गए न,
हम्म (...तुम कभी भी मेरा मतलब समझ के भी
नहीं समझोगी....)

Monday, 16 March 2015

पर्दा

कितनी ज्यादा शांति है यहां.. ठीक से बात भी नहीं कर सकते। और पर्दे कहां चले गए? पहले तो एसी में पर्दे हुआ करते थे?
हां होते तो थे। पर सुना है आजकल रेलवे ने हटवा लिए।
सभी बोगियों से हटवा लिए?
नहीं। केवल थर्ड एसी से! सेकेण्ड और फर्स्ट में होते हैं अब भी।
क्यों? बाकी एसी वाले इतने अनरोमैन्टिक होते हैं क्या?

रेड रोज़

ये गुलाब ही इतना रोमैन्टिक क्यों लगता है? क्या कहते हैं, हां.. रेड रोज़। और कुछ क्यों नहीं देते। रेड रोज़ ही क्यों। मेरे घर में गुड़हल और गेंदा भी लगा है। तुम कहो तो कल ...
नहीं
क्यों? क्यों नहीं??
क्योंकि वो आसानी से मिल जाता है।
एग्ज़ैकटली! इसीलिए तो कहा कि कल आसानी से मैं गुड़हल तोड़ लाऊंगा।
नहीं!! एक काम करना कुछ मत लाना। मुझे आज से कुछ भी देने की ज़रूरत नहीं है। समझे।
ऐसा क्यों कह रही हो?
मैंने कहा तो.. क्योंकि वो आसानी से मिल जाता है।
तो?
क्या मैं आसानी से मिली?
नहीं
फिर? जिस दिन चीज़ें आसान लगने लगीं। उस दिन मैं भी आसान लगने लगूंगी। समझे?
ह्म्म्म..

पर्ची

स्टेशन आने वाला था। न जाने फिर वो अजनबी कब दोबारा दिखती? कागज़ की पर्ची में नंबर लिखकर वो उसकी सीट पर छोड़कर उतर गया। ट्रेन चल दी। लड़की नें तुरंत पर्ची खिड़की के बाहर फेंक दी। उस दिन फोन को अपने हाथ से अलग नहीं होने दिया। बार बार फोन उठा उठाकर देखता। फोन नहीं आना था। नहीं आया। वो अब भी सोचता है कि पर्ची उसे मिली होगी या नहीं ?

चार कदम

जीता कोई नहीं पर दिल्ली उसकी शिद्दत के चलते हार गई। वो देखो, दिल्ली खड़ी है। चार कदम नहीं, पूरे पांच साल उसके साथ, उसका हांथ पकड़े चलने को।

एग्ज़िट पोल

ये एग्ज़िट पोल क्या होता है? वो होता है जो हम सुनना चाहते हैं। ज़िद करते हैं वही सुनने की जैसा कि हम होते देखना चाहते हैं। अच्छा! तो क्या प्रेम में भी एग्ज़िट पोल होता है? नहीं! नहीं होता। पर क्यों? क्योंकि प्रेम वर्तमान स्थित है, एग्ज़िट पोल भविष्य में। तुम मेरी हो ये वर्तमान है। यथार्थ है। तुम मेरी होकर रहोगी, यह तुम्हारा अतिक्रमण है, यही एग्ज़िट पोल भी है। वो दिल्ली को जी जान से चाहता है यह उसका वर्तमान है। दिल्ली को वह केवल अपना बना लेना चाहता है यह एग्ज़िट पोल। भविष्य की परवाह में वो प्रेम से परे चला जाना चाहता है। अच्छा? और तुम्हारा प्रेम क्या है? मेरा प्रेम रोज़ सभाएं करता है। पोस्टर चिपकाता है। लाठियां खाता है, बगैर सीटों और सत्ता की परवाह किए।

दिल्ली

मेरे लिए क्या कर सकते हो? कुछ भी! कुछ भी में क्या? कुछ भी...ह्म्म्म.. हां। केजरीवाल सी मोहब्बत करूंगा। तुम्हारे लिए सारी दुनिया से लड़ जाऊंगा। कैसे? केजरीवाल जैसे। इस पार एक अकेला आदमी और उस पार सारी दुनिया उसके पीछे। उसका क्या होगा मालूम नहीं। जीतेगा हारेगा.. पर शिद्दत क्या होती है, उस बंदे से पूछो। कोहराम मचा रखा है।

ये कहानी फिर सही

ये गुलाम अली की आवाज़ है? ग़ुलाम अली कितना अच्छा गाते हैं न? हां। पर ये चंदन दास हैं। नहीं, गुलाम अली ही हैं। नहीं नहीं, चंदन दास हैं। लगा लो शर्त, हार जाओगे, गुलाम अली हैं। अच्छा ठीक है- गुलाम अली हैं। सारे चंदन दास- गुलाम अली हैं। खुश?

बिजीनेस

तुम जानबूझकर मुझे लेट रिप्लाइ क्यों करते हो? ऐसा नहीं है।ऐसा है! नहीं, ऐसा बिलकुल नहीं है। मैं बस थोडा बिज़ी रहता हूं, इसीलिए। कैसे? बहुत काम रहता है? नहीं! फिर? कॉर्पोरेट सेक्टर में कोई बिज़ी रह ही नहीं सकता। फिर तुम कैसे बिज़ी हो सकते हो? फील कराना पड़ता है, डैट यू यार डैम बिज़ी राइट नाउ। भले ही काम हो न हो। फीलिंग आनी चाहिए। भले ही एक जीमेल अकाउंट को बार बार लॉगआउट और लॉगइन करते रहो। पर फील आनी चाहिए। जिस काम को १ घंटा लगता हो। उसमे २ घण्टे लगाओ। समझी कुछ! हम्म..

पॉलिटिकल व्यू

लुक, वो केजरीवाल कितना क्यूट दिखता है न? जस्ट अ सिंपल कॉमन मैन..
हां! पर उसे भागना नहीं चाहिए था। सीएम शुड बी रिस्पॉन्सिबल। किरण बेदी को देखो, बोल्ड लेडी है। काम करके दिखाएगी।
मैंने बोला न केजरीवाल। मतलब केजरीवाल। मुझे वो किरण बेदी बिलकुल भी पसंद नहीं। एण्ड यू नो व्हाट, बीजेपी मीन्स कम्यूनल पॉलिटिक्स। तुमको कुछ पता वता नहीं है। देख लेना वो आएगा और करप्शन की छुट्टी।
हां, बात तो सही है। एक बार और देख लेना चाहिए। तुम कहती हो तो। वैसे मुझे भी कोई प्रॉब्लम नहीं है उसके साथ। मैं तो बस एसई।

कॉमर्स

तुम समझते क्यों नहीं कि वो नहीं मानेंगे। उन्हें गवमेंट एम्प्लॉय चाहिए। तुमको मालूम भी है कि ये प्राइवेट जॉब वगैरह... !
हम्म
मैथ्स क्यों नहीं लिए? कॉंमर्स ले लिए। बीकॉम जैसी डिग्री और फिर एमबीए। ये तो आजकल कोई भी कर लेता है।
तो फिर क्या करता? मैथ्स वीक थी न मेरी।
ऐंजीनियरिंग करते। खैर छोडो रहने भी दो तुम। ये कहो कि कभी रिस्क ही नहीं लिया। तुम कॉमर्स वाले भी न एकदम डम्बो होते हो, डम्बो।
हम्म।
अच्छा तुम वो ग्रीन वाला सूट क्यों नहीं पहनी? कितने दिन हो गए।
उफ्फ्फ...

पजेसिवनेस

तुम मुझे लेकर इतना पज़ेसिव क्यों होते हो! मैंने बात क्या कर ली उससे, तुम तो एकदम....
कहां हुआ पोसेसिव?? ऐसा क्यों सोचती हो?
पोसेसिव नहीं, पज़ेसिव। तुमको तो ढंग से इंग्लिश भी नहीं आती।
ह्म्म.. पर देखो मुझे तुम्हारे उससे बात करने में कोई प्रॉब्लेम नहीं है। मैं पोसेसिव नहीं हूं। पर वो लड़का अच्छा नहीं है।

Monday, 2 February 2015

जै बोलो जै रेल माता की जै

बेशक रेल माता की जै। आज़ादी के बाद से निरंतर हमारी अर्थव्यवस्था का लालन पालन करने वाली रेल मइया ही तो है। इसपर शब्द कम पड़ जाएं कि रेलवे हमारे जीवन में कितना अहमियत रखती है। कभी न मिलने वाली पटरियां कितना कुछ जोड़ देती हैं। फिर भी हैरत होती है, जब प्रत्येक वर्ष के रेल बजट में माननीय मंत्री मेज़ की थपथपाहट के साथ रेलवे के घाटे से जूझने की बात स्वीकारते हैं। मेरे जैसे करोड़ों रेल उपभोक्ताओं के ज़हन में सवाल उठना लाज़मी है कि आखिर रेलवे घाटे में क्यों है? सत्तर सालों में हम केवल योजनाओं, सुधारों और क्रियान्वयन की दिशा में ही बढे हैं, फिर रेलवे इससे अछूता कैसे रह गया? क्या कमी रह गई?
भारतीय रेल राष्ट्र की एकमात्र ऐसी संपत्ति है जो आपको ऐसा महसूस भी कराती है। जनता के द्वारा जनता के लिए चलाई गई एकमात्र सुविधा जिसमें सेवा सुरक्षा और संतुष्टि के भरसक प्रयास किए गए हों। राजस्व जुटाया गया हो। साथ ही संगठित और असंगठित क्षेत्रों के लाखों लोगों को रोजगार भी मिला हो। इतना कुछ होने के बावजूद भी रेलवे के खस्ताहाल क्यों हैं? जी जलता है।
बतौर रेल उपभोक्ता, रेलवे को लेकर बचपन से अब तक, जैसा मेरा अनुभव रहा। वो यह कि रेल रेल में कभी न बैठने वालों द्वारा चलाई गई। उस कार्यक्रम की समीक्षा भी हवाइज़ादों नें ही की। और तो और रेल जैसी दुधारू गाय गठबंधन धर्म के पालन में दान कर दी गई। उसके अलावा रेलवे प्रबंधन को दी गई अतिस्वायत्ता इसका गला दबा देती है।
वाकई रेलवे में सुधारों की हद दरकार है पर वे तमाम सुधार तो रेलवे में स्वयं मौजूद हैं। इसके लिए किसी पीपीपी मॉडल की दरकार(हाइ लेवल एक्सक्यूज़) नहीं है।
पहला, तो यह कि रेल प्रबंधन के साथ साथ रेल उपभोक्ता भी अपनी जवाबदेही तय करें। वे प्राइवेट बसों तक तो उपभोक्ता बने रहते हैं। रेल में बैठते ही दामाद हो जाते हैं। ऐसा नहीं है कि वे सफाई नापंसद हों पर रेलवे के सफाई के प्रति ढुलमुल रवैये के चलते रेलवे की छवि भी हद से अधिक सहज बनी हुई है। जो करना हो कीजिए। कौन देखता है। ठीक वैसी ही स्थिति टिकट खरीदने को लेकर है। आधे से अधिक आबादी बगैर टिकट यात्रा करती है। जनरल बोगियों में तो न टीटी आते हैं न ही लोग टिकट खरीदते हैं। ऐसे हाल में मुनाफा तो दूर, लागत निकलना भी मुश्किल हो जाता है।
दूसरा, सबसे अहम बिंदु है कि रेल किराए के पैमाने में सुधार। आप लोगों को समझा सकने में ही असफल रहे कि रेलवे लूटने के लिए नहीं, बल्कि लागत निकालने के लिए किराया बढ़ोतरी करता है। ऐसी मुफ्तखोरी कब तक चलेगी? जलगांव से भुसावल जाने के लिए सरकारी बस का भाड़ा पचास रूपए है और पैसेंजर ट्रेन का पंद्रह रूपए! क्या यह किसी मुफ़्त खोरी से कम है? उसी रेल में जहाँ चाय दस रूपए और पानी बीस रूपए में बिकता है। उन दामों से कतई परहेज नहीं पर रेल किराए के वो दो रूपए विशुद्ध लूट हैं। सरकार आज स्पष्ट बहुमत और सख्त(कागज़ी) इरादों के साथ संसद में अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा रही है। देश के रेल मंत्री स्वयं एक चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं। सरकार को इतनी हिम्मत तो दिखानी ही होगी कि रेल के किराए सही दिशा में बढ़ा सके। और मुफ्तखोरों को सीधा सन्देश दे सके। सही माल गुज़ारी और किराए के सही मानक रेलवे को स्वावलंबी बनाएंगे। पैसेंजर से सुपरफास्ट कर देंगे। हमें बाहरी निवेश की ज़रूरत कम पड़ेगी।
तीसरा, यह कि रेलवे समझे कि रेल न ही कोई उच्चस्तरीय रेस्त्रां है और न ही कोई फाइव स्टार होटल। उसे इस मुग़ालते से अब बाहर आ जाना चाहिए। एक बड़ा तबका आज भी सफ़र के दो वक़्त का खाना साथ लेकर चलता है। रेल के खाने का उतना ज्यादा स्वादिष्ट या पौष्टिक होने में उसे कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता। बेहतर खाने की सुविधाओं के चलते दाम ज़रूर बढ़ जाते हैं। पर खाना वही जस का तस। खाने पर नई पर नई पहल करने से बचना होगा। पेंट्री कार के ट्रेन पर से एकाधिकार को समाप्त कर स्टेशनों और स्टेशनों से लगे व्यावसायिक होटलों को तरज़ीह दी जा सकती है। इससे सीधी प्रतिस्पर्धा तो बढ़ेगी ही। गुणवत्ता का फायदा यात्रियों तक पहुंचेगा सो अलग।
चौथा, यह कि रेल कर्मचारियों का उनके कार्य के आधार पर विभाजन। जैसे कि आरपीएफ सीधे टीटी को रिपोर्ट करे। स्लीपर में भी अटेंडर नियुक्त हों जो डब्बे की समुचित साफ़ सफाई के प्रति जवाबदेह हों। इससे डब्बों में सुरक्षा बढ़ेगी और साफ सफाई में भी पारदर्शिता आएगी।
पांचवा, और सबसे अहम् बिंदु है सीट को लेकर। जनरल से लेकर एसी कोचों तक में सीट की अनुपलब्धता एक बड़ी समस्या है। किराया बढ़ाए जाने की बजाय किराया लेकर भी सीट उपलब्ध न कराना लूट जरूर है। इसका हल रेलवे हर साल ट्रेनों में बढ़ोतरी कर के निकालना चाहता है। असफल रहता है। उन प्रस्तावित ट्रेनों में से कितनी ट्रेनें चल पाती हैं? स्वयं रेल मंत्री भी इससे अनिभिज्ञ होंगे। हम ट्रेन में डब्बे बढ़ाने पर जोर क्यों नहीं देते? बढ़ती आबादी के साथ क्या यह ज़रूरी नहीं कि ट्रेनों में जनरल के डब्बे चार से आठ हों? स्लीपर और एसी डब्बों की संख्या में बढ़ोतरी हो? हम बुलेट ट्रेन के सपने पर बेवजह खर्च करने की बजाय हाईटेक इंजनों के निर्माण पर खर्च क्यों नहीं करते? जो तीस तीस डब्बे आसानी से खींच सकें। फर्राटा दौड़ सकें।
छटवां, यह कि रेलवे को कुछ बचकानी परंपराएं अब तोड़ देनी चाहिए। जैसे कि प्रत्येक प्लेटफॉर्म में टिकट खिड़की हो। रेल नीर जैसे बेवजह के निवेश बंद हों। रेलवे का काम ट्रेन चलाना है न कि पानी बेचना। छोटे से छोटे स्टेशनों पर भी यात्री विश्रामगृह को होटलों की तर्ज़ पर निर्मित करना। मौजूदा व्यवस्था में महिला यात्री साथ न होने पर कमरा नहीं दिया जाता। आपको अकेले डॉरमेट्री में पड़ा रहना पड़ता है। अपडाउनर्स को लेकर अलग खाका तैयार किया जाए, उनके लिए अलग बोगी हो। आरपीएफ और जीआरपी का एकीकरण और सुरक्षा जैसे गंभीर मसलों पर हमें और भी आगे जाना है।
सातवां, यह कि, निजीकरण हल न होकर केवल जिम्मेदारियों से बचना है। सरकार मूलभूत ज़रूरतों से पर्दा करके निजी निजी का राग पिछले दस सालों से अपना ज़रूर रही है। सफाई और भोजन का हमने निजीकरण किया। नतीजा सामने है।
आठवां, यह कि हम कोटावाद से बहार आएं। सैंकड़ों कोटे हैं जिनकी कोई ज़रूरत नहीं, जो रेलवे के लिए केवल घाटे का काम करते हैं। सांसद प्रतिनिधि और परिजनों का कोटा समाप्त हो। रेल कर्मचारियों का कोटा बंद हो। पद्म पुरुस्कार विजेताओं को दी जाने वाली सामंती रियायत बंद हो। उक्त सभी रेल किराए को देने में सक्षम होने के बावजूद बड़ी ऐंठ के साथ मुफ़्त सफ़र करते हैं।
नौंवा, और अंतिम यह कि पांच सालों के लिए सभी नए प्रोजेक्ट्स आने बंद हों। साथ ही पुराने प्रोजेक्ट्स पर समीक्षा भी हो। बेवजह के प्लान रोक दिए जाएं और बड़े बजट के साथ हम ज़रूरी प्रोजेक्ट्स पर आगे बढ़ें। हम फिलहाल बुलेट ट्रेन को भूलकर सामान्य कोचों में मूलभूत सुविधाएं विकसित करें। सिंगल ट्रैक को डबल और मीटर गेज़ को ब्रॉड गेज़ करने पर निवेश करें। साथ ही हम मालगुज़ारी को और आसान बनाने की ज़िद करें।
पुनश्च: इन सब सुझावों में सबसे बड़ी ज़रूरत है रेल किरायों में बाबा आदम में ज़माने के मानकों में सुधारों की। सरकार बेखौंफ होकर वाज़िब दाम वसूले। लोगों के दिमाग में जो मुफ़्तखोरी की आदत लग चुकी है, उससे उन्हें निजाद दिलाए। लोगों में यह सोच विकसित करें कि स्वाभाविक महंगाई का मुकाबला तो वे कुछ अतिरिक्त मेहनत के बल पर अपनी आय बढाकर तो कर ही सकते हैं। बहरहाल, इन सबको वक़्त के साथ अमल में आता देख मैं भारतीय रेल को तमाम विश्वस्तरीय सुविधाओं के बीच इठलाते हुए चलता देखता हूं। उसमें मेरा भारत सफ़र करता है। दिन को दूना और रात चौगुना भागता है। विकास के नए नए चकाचक स्टेशनों पर उतरता है।

Tuesday, 27 January 2015

ऑटोक्रेटिक रोमियो


उस गांव में रोमियो सबसे हैंडसम लड़का और जूलियट ही सबसे खूबसूरत लड़की थी। विकल्प न था। पास किसी गांव तक पहुंचने के ऐसे कोई बड़े साधन न थे। इंटरनेट मोबाइल वगैरह भी न था। केवल वे दोनों ही थे। जूलियट कॉलेज में भी नहीं पढ़ती थी, और न ही रोमियो किसी कोचिंग में जाता। सो, जूलियट को कोई बेस्टी न मिल सका, रोमियो को भी किसी पर क्रश नही आ पाया। प्रेम क्यों न होता। क्योंकि उन दोनों के पास कोई विकल्प न था। विकल्प लोकतंत्र पैदा करता है। और लोकतंत्र एकाधिकार ख़त्म कर देता है।

Tuesday, 20 January 2015

मंज़िलें उनको मिलीं, जो दौड़ में शामिल न थे !

दिल्ली विधानसभा में टिकट न मिल सकने की वजह से निराश नेता और उनके समर्थक कार्यकर्ता इस्तीफ़े पर इस्तीफ़ा दिए जा रहे हैं। झंडे बैनर और आम सभाओं के बीच टिकट न मिल पाना कोप भवन निर्मित कर देता है। पर यह निराशा नहीं, निरा अहंकार है। राजनीति और अहंकार का चोली दामन का साथ है। टिकट पाने की चाह अहंकार जगाती है। पद पा लेने के बाद अहंकार बढ़ जाता है और टिकट न मिल सकने की सूरत में अहंकार हावी हो जाता है, इस्तीफ़े तक पहुंच जाता है। ऐसे नेताओं के समर्थक भी अपने अहंकार के प्रति सजग रहते हैं। उनके साथ खिंचाई तस्वीर घर के पहले कमरे में टंगी मिलती है। यह समर्थकों का अहंकार है। सत्ता के मद और अहंकार में चूर नेता ही अक्सर उलूल जुलूल बयाबाजी करते हैं। मैं पिछले कई सालों पूर्व गुजरात दंगों से इतर, नरेंद्र मोदी की कार्यशैली से खासा प्रभावित था। पर जब मोदी को दो बार करीब से देखने मौका मिला। उनकी चलने के तरीका, बात करने का सुर(आठवां सुर) उनके हद से अधिक अहंकारी होने का सबूत देता है। गोवा अधिवेशन के दौरान संजय जोशी के ख़िलाफ़ मोदी का यह रवैया 'कि उससे पहले इस्तीफ़ा लो, तभी मैं अधिवेशन में हिस्सा लूंगा', इसका और भी पुख्ता सबूत देता है। समझ से परे है कि प्रधानमंत्री की ऐसी अकड़ को लोग भारत के गौरव से जोड़ कर भला कैसे देख लेते हैं।
किरण बेदी के एकाएक भाजपा से जुड़ने और मुख्यमंत्री दावेदारी हथिया लेने से मौजूदा संभावितों का अहंकार भी साफ़ पता पड़ता है। लोगों का ईगो हर्ट हो गया।
"आज वो काबिल हुए जो कभी काबिल न थे। मंज़िलें उनको मिलीं, जो दौड़ में शामिल न थे।"
नेताओं के चेहरे लटक गए। पेट में मरोड़ पड़ने लगे। कांग्रेसी नेताओं को अपनी ज़मीन खिसकती मालूम हुई तो पाला बदल दिया। हारेंगे नहीं, भले ही पार्टी बदल लें। वही भाजपा, जो कल तक अछूत थी।  आज अपनी लगने लगी। आज उसी की बदौलत चुनाव जीत लेंगे। बस कुर्सी का अहंकार बना रहे। टूटने न पाए। बागी हो भी गए तो क्या।
ऐसी राजनीति, चाहे जिस किसी भी दल की हो। विकास से उसका कोई ताल्लुक होना असंभव है। ऐसे आभा मंडल से निकला व्यक्ति चुनाव जीतने के बाद आम आदमी से क्या सरोकार रखेगा, जनता से कैसा संपर्क स्थापित हो सकेगा, इसमें संशय है। राजनीति को भ्रष्टाचार से अधिक नेताओं के अहम् से खतरा है। और ऐसी राजनीती से समाज को भी।

Sunday, 4 January 2015

फ़िल्म समीक्षा: पीके

पीके महज़ एक ही बार देखे जाने लायक औसत फ़िल्म है। आमिर खान का पुराना प्रशंसक होने के नाते उनकी आलोचना मुझसे की नहीं जाती और अनुष्का शर्मा के सौंदर्य के आगे मेरे भीतर छिपा बैठा एक बचा खुचा समीक्षक भी दम तोड़ जाता है। पर फिर भी, इसमें ऐसा कुछ भी तो नहीं जिसे हद से अधिक सराहा जाए, आलोचक इसे कोसें या समर्थक इसे एकमात्र ब्रम्हसत्य मान बैठें। गोया कि एक बात ज़रूर साफ़ हो गई कि हमारे समाज में दो तरह के वर्ग बड़ी तेजी से उदयीमान हैं। पहला जो खुद को अतिप्रगतिशील ठहराना चाहता है और दूसरा वह जो सब कुछ जान लेने के बावजूद भी बेवकूफ बना रहना चाहता था। बेवकूफी पर टिके रहना ही उसके लिए संप्रदाय की एक मात्र परिभाषा और प्रगतिशीलों का विरोध है। धर्म इन सभी से इतर किसी तीसरे वर्ग के लिए बना है। और अब तक कायम भी है।
पीके जैसी फिल्मों को केवल एक आला मंच और अदद दर्शकों का तकाज़ा है। न ही किसी विवाद या समर्थन का। लेकिन ऐसी फिल्मों का असर वैसा होता नहीं दीखता जैसा प्रयोजन इनके निर्माण के पीछे रहा होगा। कहते हैं कि जिस किसी मुल्क में फुटबॉल विश्वकप का आयोजन हो रहा हो, उस मुल्क में अपराधों में तेजी से बढ़ोतरी देखने मिलती है। विश्वकप तो अपने समय पर खत्म हो जाता है पर लोगों की गर्मी कहां जाए? इस दौड़ती भागती दुनिया में, जहां श्रोताओं की कमी है। वक़्त की कमी है। जहां कोई किसी को सुनना-समझना नहीं चाहता। ऐसे में धार्मिक स्थल और करोड़ों देवी देवताओं की बड़ी भूमिका है लोगों को दिलासा देने की। वो कहते हैं न कि दिल सब समझता हो तो मुश्किल है जीना। जीना आसान बन जाए जब दिल को हम बुद्धू बनाना सीख जाएं। मंदिर मस्जिद ऐसे ही दिलासा देते संस्थान हैं।
दुनिया की समस्याओं का अंत करना नामुमकिन है। लेकिन विवेकपूर्ण ढंग से धर्म का विस्तार करना इतना बुरा भी तो नहीं। धर्म को विवेकपूर्ण ढंग से समझना धर्म में फैले बाबावाद और थैलीवाद को एक दिन समाप्त कर देगा पर धर्म पर ही अड़ंगा लगाना दुनिया को एक ऐसे पागलखाने में तब्दील कर देगा। जहां वक्ता ही वक्ता हों पर कोई श्रोता न हो। कोई सुनने वाला न मिले। ईश्वर और ईश्वर नाम से जुड़े संस्थानों का शुक्रिया जो दुनिया को खत्म होने से बचाय हुए हैं। आमिर खान का शुक्रिया जो ऐसे संस्थानों पर भक्तों को फिर से सोचने समझने और आँखे खोले रखने पर गाहे बगाहे चिकोटी काटते रहते हैं।