मैंने पीछे पलट कर देखा। वो मुझे गले लगाने को आगे बढ़ रही थी। मैं फ्रेंच स्टाइल मोड़ में आकर खुद को थोडा टेढ़ा मोड़ा और उसे मुझे गले लगा लेने दिया। पांच छह सेकेंड के बाद हमारी नज़रें प्लेटफॉर्म पर खड़ी भीड़ पर थी जो एकटक हमें घूरे पड़ी थी।
मैंने झेंपते हुए एक बार फिर उसे टाटा बाय कहा। और वड़ोदरा के प्लेटफॉर्म सात से एक की ओर बढ़ता गया। फिर न ही मैं पलटने की हिम्मत में था न वो मुझे दोबारा आवाज़ देने की।
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मुझे शुक्रवार को अर्जेंटली आगरा जाना पड़ा। कभी कभी आप मजबूर होते हैं पर कोई और चारा न होते देख उस मजबूरी में ही दिलचस्पी ले बैठते हैं। अगस्त क्रान्ति ने धोखा नहीं दिया। वोटिंग कंफर्म हो गई और मैं सुबह मथुरा और मथुरा से टैक्सी से सवा घण्टे में आगरा पहुंचा। दोपहर को ऑफिस और फिर अगले दिन के इतवार की बलि देकर मुझे सुबह मथुरा से गोल्डन टैम्पल पकड़नी थी। मथुरा पहुंचते लेट हो गए थे। गोल्डन जा चुकी थी। मुझे एकाएक क्या सूझा कि क्यों न दिल्ली चला जाए और निजामुद्दीन से गरीब रथ पकड़ कर सूरत निकल जाएंगे।
मैंने राहुल को फोन किया। हम जुमा जुमा दो साल बाद मिल रहे थे। मैंने मथुरा से महाकौशल एक्स पकड़ी और डेढ़ बजे निजामुद्दीन उतरा। सवा तीन पर गरीब रथ थी। मैं ढंग से दिल्ली घूमना चाहता था। कि अब आ ही गए हैं तो ....
हमनें इंद्रप्रस्थ से मैट्रो ली। राजीव चौक होते हुए सेंट्रल सेक्रेटेरियट और फिर पार्लियामेंट, प्रेजिडेंट हाउस, इंडिया गेट और फिर वापिस सेन्ट्रल सेक्रेटेरियट। मेरा चिकन खाने का मन हुआ तो हम चांदनी चौक निकल गए। सिंघी के यहां चिकन खाया और थोड़ी बहुत पी ली। दिन में पीने के बाद आप कुछ ज्यादा एनर्जेटिक हो जाते हो। बहरहाल।
चांदनी चौक से हम वापस इंद्रप्रस्थ आए और फिर निजामुद्दीन गए। पता चला कि गरीब रथ तो कब का छूट गई। पश्चिम एक्स निजामुद्दीन रूकती ही नहीं। अगली ट्रेन थी रात ग्यारह बजे और मेरी जान निकली जा रही थी। मैंने कोटा होकर ट्रेन बदलते हुए जाने का विचार बनाया और मेवाड़ एक्स धर ली। एक अपर बर्थ खाली देख मैं उसकी ओर लपका। नींद लग गई। जो सवाई माधोपुर निकलने के बाद खुली। दो बजे मैं कोटा पहुंचा। और फिर वहां से रात चार बजे जम्मूतवी-जामनगर पकड़ी। मैंने टीटी की ओर पांच सौ का पत्ता उसके कुछ न नुकुर करने से पहले ही पकड़ा दिया। मुझे बर्थ मिली एस12 में।
गेट में ब्लैक कैपरी और सफ़ेद टॉप पर एक लड़की खडी थी। मैं उसे लगभग नज़रअंदाज़ करता हुआ सीट पर जाकर लगभग बेहोश हो गया। सुबह नागदा आया। और मेरी नींद खुली। वो मेरे सामने की ही मिडिल बर्थ में लेटी हुई मुझे देखकर मुस्कुरा रही थी। मैंने उसे डर्टी लुक दिया। वाज़िब बात है आप सोकर उठो और कोई अजनबी पर सुन्दर सी कन्या आपको देखकर मुस्कुराती हुई मिले तो कैसा लगेगा?
सौरी?
नथिंग(वो फिर दांत निपोरने लगी)
ओके
मैंने बाथरूम जाकर अपना हुलिया ठीक किया। सीट पर चाय मंगाई। थोड़ी देर बाद उसनें मुझे लेज़ ऑफर की।
थैंक्स (मैंने मना कर दिया)
नहीं प्लीज़ एक ही ले लीजिए
मैं चिप्स नहीं खाता (मैंने फॉर्मेलिटी करना बेहतर समझा)
अब उसनें मुझे डर्टी लुक दिया
इतना ईगो ठीक नहीं प्रियम (मैंने खुद को समझाया)
कहां जा रही हो आप?
जी मैं आणंद, और आप?
मैं सूरत, वड़ोदरा से चेंज करूंगा
मैंने गौर किया कि बर्थ में वो हर किसी से बिंदास बात कर रही थी। कभी वो दरवाज़े पर खड़ी हो जाती तो कभी कुछ तो कभी कुछ। रतलाम में मै कुछ लेने उतरा तो उसनें फिर स्माइल दी। जवाब में उसके लिए मैंने पोहे ला दिए।
ट्रेन चली और हमारी पोहा टॉक शुरू हो चुकी थी।
क्या करती हो आप?
मैं हाउसवाइफ हूं, अभी हबी के साथ दिल्ली सैटल हुई हूं। आणंद मेरा ससुराल है और मायका अहमदाबाद में है।
ओके। बट आप मैरिड लगती नहीं हो।
(किसी लड़की को और क्या चाहिए इसे सुनने के सिवाय। वो मुस्कुराई।)
और हसबैंड?
वो दिल्ली में एक सौफ्टवेयर कंपनी में हैं। हम लोग दिल्ली में सैटल हुए हैं और मॉम और डैड इन लॉज़ वहीँ आणंद में रहते हैं।
गुजराती?
नहीं। मैं एमपी से हूं।
फिर वो मुझसे मेरे बारे में पूछने लगी।
अपने हसबैंड की फोटो और महज़ तीन महीने पहले की फ़ोटोस दिखाने लग गई।
उसनें अपने पति की तस्वीर दिखाई(जो शक्ल से काफी गुस्सैल और अनरोमैन्टिक प्रतीत होता था)
ये मेरी सिस, ब्रो, और ये मेरी मम्मा ये पापा। और ये फादर इन लॉ। ये मेरी सासु मां। और ये मेरी सासु मां के बॉयफ्रेंड।
सासु मां के बॉयफ्रैंड???
हां
मेरे हसबैंड तो कहते हैं तू भी एक बॉयफ्रैंड बना ही ले।
क्या बकवास है?
रियली! इनफैक्ट उनकी भी कई गर्लफ्रेंड हैं।
मैं सुनकर सोचता रह गया कि कैसे रियेक्ट करना बेहतर होगा।
आपको कोई प्रॉब्लम नहीं होती??
नहीं। क्योंकि मैं शांति चाहती हूं। जो जैसा है एडजस्ट करना ही होगा। और मैं खुश हूं। बहुत खुश। (अब वो मुझसे ढंग से आँखें तक नहीं मिला पा रही थी।)
मैंने उसे थोडा कम्फर्टेबल करते हुए उसकी हॉबीज़ और खूबसूरती के राज़ पर चर्चा छेड़नी सही समझी। वो फिर बिंदास मोड़ में लौट आई। उसनें बताया कि वो सुबह पांच बजे उठकर उनका ब्रेकफास्ट और लांच तैयार करती है और उनके ऑफिस जाने के बाद का समय अपनी पड़ोसन के साथ बतियाने और टीवी के सामने गुजारती है। (उसनें उस पड़ोस की फोटो भी दिखाई, जो लाल साडी में एक भद्दी महिला से अधिक नहीं लग रही थी)
मुझे तो दर्शन के इनसे भी अफेयर होने के चांसेज लगते हैं। पहले वो इन्हें दर्शन जी कहती थी और अब केवल दर्शन, हुह।
(मेरा मन था कि उससे पूछ ही लूँ कि लड़की, तू अपने मन को इतना बेवकूफ भला कैसे बना लेती है? बता कहां से लाती है इतना टॉलरेंस!)
आप वाट्सएप यूज़ करते हो?
हां करता हूं।
उसनें मेरा नंबर मांगा। मैंने फौरन दे दिया।
आसपास बैठे लोग अब मुझे बुरी तरह घूर रहे थे। वे मुझे उसके साथ बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे। मुझे मज़ा आ रहा था उनके पीले पड़े चेहरों को देखकर। मर्दों के लिए इससे अच्छा क्या होगा कि डब्बे की सबसे खूबसूरत लड़की केवल उसी से बतिया रही है और बाकी सब देखे जा रहे हों।
अचानक मेरी नज़रें उसके डार्क सर्कल्स पर गईं। (हालांकि जानी तो नहीं चाहिए)
ये कैसे? (मैंने उसकी आँखों के तरफ इशारा करते हुए कहा।)
तुम साफी पिया करो।
वो समझ गई थी कि मैं काफी कुछ समझ चुका हूं। एनिवेज़।
उसनें बताना शुरू किया कि वे दोनों उतने करीब भी नहीं हैं। उसे अब एक्साइटमेंट होनी भी बन्द हो गई है और उसनें उसी में खुश रहना शुरू कर दिया है।
तुम वर्जिन हो? (उसनें पूछा)
नो पर्सनल क्वेश्चन प्लीज़। मैं अभी उतना कम्फर्टेबल नहीं हूं।
इट्स ओके।
वैसे लगते नहीं हो। ( उसनें फिर खींसे निपोर दीं)
मैंने कोई रियेक्ट नहीं किया।
मैंने देखा कि इस बीच उसके पति का एक भी फोन उसे नहीं आया था। हां अलबत्ता उसके कजिन्स, भाई और सास ससुर कई कई बार उसे याद कर चुके थे।
गोधरा आया तो उसनें इशारों में मुझे वाश बेसिन तक आने को कहा।
फेस वाश करोगे? (उसनें मुंह धोते हुए कहा)
वो बाजू वाला बंदा न इतना हरामी है, कल पता है बात ही बात में उसनें दो बार मेरी थाइस टच कीं। मेरे ऑब्जेक्शन के बाद वो एकदम चुप हो गया है। पता है वो हमें घूर रहा था।
डोंट वरी। (मैंने मुंह धोते हुए कहा)
कुछ देर हम मुंह बंद करके दरवाज़े पर साथ खड़े रहे।
तुम्हारे हसबैंड या तो काफी शाई हैं या फिर बाहर ही सारा वक़्त खर्च आते हैं। तुम समझ रही हो न? (मैंने उससे आँखें मिलाते हुए कहा)
ह्म्म्म, आई नो। पर मैं क्या करूं?
ट्राई ट्राई एन्ड ट्राई।
फिर भी कुछ न हासिल हुआ तो?
तो फिर और कोशिश करो उसे या उसके लिए खुद को बदलने की। आफ्टरऑल वो तुम्हारा है।
हां, पर मैं जानती हूं कि फिर भी कुछ भी नहीं बदलेगा।
तो फिर तुम्हे आज़ादी है अपनी ज़िन्दगी अपने मुआफिक जीने की। वो सब करने की जो जायज़ है और वो सब कुछ छिपते हुए करने की भी जो नाजायज़ है।
वो एकदम चुप थी। वड़ोदरा आ रहा था।
हम दरवाज़े से हटे और मैं जाकर अपना बैग लिया। ट्रेन प्लेटफॉर्म में लग रही थी। मैंने उसे बाय कहा। उसनें स्माइल दी और हांथ आगे बढ़ाया।
मैं हांथ मिलाकर आगे बढ़ गया। मैं मन ही मन सोच रहा था कि जब ये गुजरातन दिल्ली वापस जाए तो उसे सब कुछ बदला बदला मिले।
