Monday, 30 April 2012

सारी दुनिया का बोझ हम उठाते हैं -''श्रम दिवस''

  
 श्रम दिवस जुलूस निकालने, मशाल जलाने, या नारा लगाने का दिन नही, ये दिन एक छोटी सी कसम खा कर भी पूरा किया जा सकता है कि भले ही हम कितने भी भ्रष्ट और कमीने क्यों ना बन जायें, कभी भी किसी रिक्शेवाले का पैसा नहीं मारेंगे और कुली को हमेशा पूरे पैसे देंगे ...




मुझे मोलभाव करने की बहुत बुरी आदत है, हर जगह बस कुछ कम करो, देखो शायद कुछ कम हो जाये, कुछ कम का लगाओ, वगैरह वगैरह. और आखिर क्यों ना करें, पैसे बचाती है ये कला. अक्सर चाय की टापरी से लेकर सब्जी बाजार तक मैं हर जगह मोलभाव कर देता हू, भाड़ में जाये लडकियां, देख भी ली तो क्या हुआ, पैसे तो बच जायेंगे ना. मेरा बस चले तो मैं KFC में भी एक बार मोलभाव करने की कोशिश ज़रूर करू,
वैसे तो लोग कहते हैं कि तुम अपने पिताजी पर बिलकुल भी नही गए, लेकिन मोलभाव का यह एकमात्र गुण पिताजी की ही देन है. उनको अगर रोका ना जाये तो अम्बानी से भी मोलभाव कर आयें.

मैंने बस एक जगह मोलभाव करने से खुद को हमेशा से दूर रखा है, रिक्शेवाले, मजदूर और कुली. एक डर सा लगने लगता है खुद से कि मेरी इनसे बचाए हुए चंद सिक्के इनकी आमदनी और रोटी पर प्रश्नचिंह लगा देंगे, खुद से ही प्रश्न करने का मन करने लगता है कि आखिर कमा ही कितना रहा है वो जो मैं बचाना चाह रहा हूँ..?

दो साल पहले मैंने अपने दोस्तों के साथ कुछ अजीब सी हरकत की थी, चलो आज रिक्शा चलाएंगे, मैंने सबको बैठाया और चला दिया, ज्यादा नही तीन ही तो दोस्त थे, बड़ा मज़ा आया, और फिर, एक हफ्ते तक कमर पीसा की झुकी मीनार की तरह टेढ़ी हो चुकी थी. मैं जब भी किसी रिक्शेवाले को पांच पांच सवारियां बैठाए देखता हूँ, तो बस खुद से यही सवाल करता हूँ की या तो मैं बहुत कमज़ोर हूँ जो तीन भी ढो ना सका, या फिर वो इतना मजबूर है कि बिना किसी आह के पांच पांच ढो रहा है, वो भी दिन भर, चिलचिलाती धुप में, या फिर वैसी बरसात में जब छाता भी टेढा हो जाता है, या फिर मार डालने वाली ठण्ड में.

गाँधी या नेहरु को सलाम करके आप शायद चुनाव लड़ सकते हैं, जीत भी सकते हैं, लेकिन रिक्शेवालों के हौंसलों को सलाम करे बिना जिंदगी के संघर्ष नही समझे जा सकते.

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ये कैसा भारत है..???
यहाँ 100 किलो अनाज का बोरा 'जो उठा सकता' है वो उसे 'खरीद नहीं सकता' और 'जो खरीद सकता है' 'वो उठा नहीं सकता' ...


इतिहास की पुस्तकों में छपी बातों पर गौर करे तो यही बस दिखता है कि भारत में विभिन्न कम्युनिस्ट ताकतों और यूनियनों के प्रभाव से श्रम और श्रमिकों कि मांगों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है
सुनने में काफी अच्छा लगता है, हो सकता है ये सही भी हो, क्योंकि बार बार चलाये जा रहे प्रयत्नों से कुछ तो हासिल होना ही चाहिए, नहीं तो पूरे विश्व को साम्यवाद का पाठ पढाने वाला कार्ल मार्क्स को मूर्ख ही समझा जाएगा.
भारत में एक बड़े पैमाने में श्रमिकों के एकीकरण और सशक्तिकरण के काफी प्रयास किये गए, यूनियंस बनाई गयी, मोर्चे बनाये गए, लाल सलाम ठोके गए, लेकिन भारतीय श्रमिक शायद इतना कुछ होने के बावजूद ऊपर नहीं आ सका. हालांकि चीन में यही सिद्धांत काफी सफल हुआ, वजह भी थी, भारी मात्रा में कुशल और सस्ता श्रम. भारत में भारी मात्रा तो मौजूद है लेकिन कार्यकुशलता में आज भी हम विकसित देशों से काफी पीछे हैं.

खैर जो भी हो, एक रिक्शावाले को श्रम यूनियनों से कुछ हासिल नहीं होने वाला, उसे तो बस इसी बात में चैन है कि ‘’सवारी मिलती रहे, रिक्शा चलता रहे,’’
श्रम दिवस जुलूस निकालने, मशाल जलाने, या नारा लगाने का दिन नही, ये दिन एक छोटी सी कसम खा कर भी पूरा किया जा सकता है कि भले ही हम कितने भी भ्रष्ट और कमीने क्यों ना बन जायें, एक रिक्शेवाले का पैसा नहीं मारेंगे. कुली को पूरे पैसे देंगे. और मजदूर की जान नही बल्कि उसकी सेवाएं लेंगे,

सच्चे मायने में यही श्रम दिवस होगा,.......

-पं प्रियम तिवारी