Tuesday, 27 January 2015

ऑटोक्रेटिक रोमियो


उस गांव में रोमियो सबसे हैंडसम लड़का और जूलियट ही सबसे खूबसूरत लड़की थी। विकल्प न था। पास किसी गांव तक पहुंचने के ऐसे कोई बड़े साधन न थे। इंटरनेट मोबाइल वगैरह भी न था। केवल वे दोनों ही थे। जूलियट कॉलेज में भी नहीं पढ़ती थी, और न ही रोमियो किसी कोचिंग में जाता। सो, जूलियट को कोई बेस्टी न मिल सका, रोमियो को भी किसी पर क्रश नही आ पाया। प्रेम क्यों न होता। क्योंकि उन दोनों के पास कोई विकल्प न था। विकल्प लोकतंत्र पैदा करता है। और लोकतंत्र एकाधिकार ख़त्म कर देता है।

Tuesday, 20 January 2015

मंज़िलें उनको मिलीं, जो दौड़ में शामिल न थे !

दिल्ली विधानसभा में टिकट न मिल सकने की वजह से निराश नेता और उनके समर्थक कार्यकर्ता इस्तीफ़े पर इस्तीफ़ा दिए जा रहे हैं। झंडे बैनर और आम सभाओं के बीच टिकट न मिल पाना कोप भवन निर्मित कर देता है। पर यह निराशा नहीं, निरा अहंकार है। राजनीति और अहंकार का चोली दामन का साथ है। टिकट पाने की चाह अहंकार जगाती है। पद पा लेने के बाद अहंकार बढ़ जाता है और टिकट न मिल सकने की सूरत में अहंकार हावी हो जाता है, इस्तीफ़े तक पहुंच जाता है। ऐसे नेताओं के समर्थक भी अपने अहंकार के प्रति सजग रहते हैं। उनके साथ खिंचाई तस्वीर घर के पहले कमरे में टंगी मिलती है। यह समर्थकों का अहंकार है। सत्ता के मद और अहंकार में चूर नेता ही अक्सर उलूल जुलूल बयाबाजी करते हैं। मैं पिछले कई सालों पूर्व गुजरात दंगों से इतर, नरेंद्र मोदी की कार्यशैली से खासा प्रभावित था। पर जब मोदी को दो बार करीब से देखने मौका मिला। उनकी चलने के तरीका, बात करने का सुर(आठवां सुर) उनके हद से अधिक अहंकारी होने का सबूत देता है। गोवा अधिवेशन के दौरान संजय जोशी के ख़िलाफ़ मोदी का यह रवैया 'कि उससे पहले इस्तीफ़ा लो, तभी मैं अधिवेशन में हिस्सा लूंगा', इसका और भी पुख्ता सबूत देता है। समझ से परे है कि प्रधानमंत्री की ऐसी अकड़ को लोग भारत के गौरव से जोड़ कर भला कैसे देख लेते हैं।
किरण बेदी के एकाएक भाजपा से जुड़ने और मुख्यमंत्री दावेदारी हथिया लेने से मौजूदा संभावितों का अहंकार भी साफ़ पता पड़ता है। लोगों का ईगो हर्ट हो गया।
"आज वो काबिल हुए जो कभी काबिल न थे। मंज़िलें उनको मिलीं, जो दौड़ में शामिल न थे।"
नेताओं के चेहरे लटक गए। पेट में मरोड़ पड़ने लगे। कांग्रेसी नेताओं को अपनी ज़मीन खिसकती मालूम हुई तो पाला बदल दिया। हारेंगे नहीं, भले ही पार्टी बदल लें। वही भाजपा, जो कल तक अछूत थी।  आज अपनी लगने लगी। आज उसी की बदौलत चुनाव जीत लेंगे। बस कुर्सी का अहंकार बना रहे। टूटने न पाए। बागी हो भी गए तो क्या।
ऐसी राजनीति, चाहे जिस किसी भी दल की हो। विकास से उसका कोई ताल्लुक होना असंभव है। ऐसे आभा मंडल से निकला व्यक्ति चुनाव जीतने के बाद आम आदमी से क्या सरोकार रखेगा, जनता से कैसा संपर्क स्थापित हो सकेगा, इसमें संशय है। राजनीति को भ्रष्टाचार से अधिक नेताओं के अहम् से खतरा है। और ऐसी राजनीती से समाज को भी।

Sunday, 4 January 2015

फ़िल्म समीक्षा: पीके

पीके महज़ एक ही बार देखे जाने लायक औसत फ़िल्म है। आमिर खान का पुराना प्रशंसक होने के नाते उनकी आलोचना मुझसे की नहीं जाती और अनुष्का शर्मा के सौंदर्य के आगे मेरे भीतर छिपा बैठा एक बचा खुचा समीक्षक भी दम तोड़ जाता है। पर फिर भी, इसमें ऐसा कुछ भी तो नहीं जिसे हद से अधिक सराहा जाए, आलोचक इसे कोसें या समर्थक इसे एकमात्र ब्रम्हसत्य मान बैठें। गोया कि एक बात ज़रूर साफ़ हो गई कि हमारे समाज में दो तरह के वर्ग बड़ी तेजी से उदयीमान हैं। पहला जो खुद को अतिप्रगतिशील ठहराना चाहता है और दूसरा वह जो सब कुछ जान लेने के बावजूद भी बेवकूफ बना रहना चाहता था। बेवकूफी पर टिके रहना ही उसके लिए संप्रदाय की एक मात्र परिभाषा और प्रगतिशीलों का विरोध है। धर्म इन सभी से इतर किसी तीसरे वर्ग के लिए बना है। और अब तक कायम भी है।
पीके जैसी फिल्मों को केवल एक आला मंच और अदद दर्शकों का तकाज़ा है। न ही किसी विवाद या समर्थन का। लेकिन ऐसी फिल्मों का असर वैसा होता नहीं दीखता जैसा प्रयोजन इनके निर्माण के पीछे रहा होगा। कहते हैं कि जिस किसी मुल्क में फुटबॉल विश्वकप का आयोजन हो रहा हो, उस मुल्क में अपराधों में तेजी से बढ़ोतरी देखने मिलती है। विश्वकप तो अपने समय पर खत्म हो जाता है पर लोगों की गर्मी कहां जाए? इस दौड़ती भागती दुनिया में, जहां श्रोताओं की कमी है। वक़्त की कमी है। जहां कोई किसी को सुनना-समझना नहीं चाहता। ऐसे में धार्मिक स्थल और करोड़ों देवी देवताओं की बड़ी भूमिका है लोगों को दिलासा देने की। वो कहते हैं न कि दिल सब समझता हो तो मुश्किल है जीना। जीना आसान बन जाए जब दिल को हम बुद्धू बनाना सीख जाएं। मंदिर मस्जिद ऐसे ही दिलासा देते संस्थान हैं।
दुनिया की समस्याओं का अंत करना नामुमकिन है। लेकिन विवेकपूर्ण ढंग से धर्म का विस्तार करना इतना बुरा भी तो नहीं। धर्म को विवेकपूर्ण ढंग से समझना धर्म में फैले बाबावाद और थैलीवाद को एक दिन समाप्त कर देगा पर धर्म पर ही अड़ंगा लगाना दुनिया को एक ऐसे पागलखाने में तब्दील कर देगा। जहां वक्ता ही वक्ता हों पर कोई श्रोता न हो। कोई सुनने वाला न मिले। ईश्वर और ईश्वर नाम से जुड़े संस्थानों का शुक्रिया जो दुनिया को खत्म होने से बचाय हुए हैं। आमिर खान का शुक्रिया जो ऐसे संस्थानों पर भक्तों को फिर से सोचने समझने और आँखे खोले रखने पर गाहे बगाहे चिकोटी काटते रहते हैं।