पीके महज़ एक ही बार देखे जाने लायक औसत फ़िल्म है। आमिर खान का पुराना प्रशंसक होने के नाते उनकी आलोचना मुझसे की नहीं जाती और अनुष्का शर्मा के सौंदर्य के आगे मेरे भीतर छिपा बैठा एक बचा खुचा समीक्षक भी दम तोड़ जाता है। पर फिर भी, इसमें ऐसा कुछ भी तो नहीं जिसे हद से अधिक सराहा जाए, आलोचक इसे कोसें या समर्थक इसे एकमात्र ब्रम्हसत्य मान बैठें। गोया कि एक बात ज़रूर साफ़ हो गई कि हमारे समाज में दो तरह के वर्ग बड़ी तेजी से उदयीमान हैं। पहला जो खुद को अतिप्रगतिशील ठहराना चाहता है और दूसरा वह जो सब कुछ जान लेने के बावजूद भी बेवकूफ बना रहना चाहता था। बेवकूफी पर टिके रहना ही उसके लिए संप्रदाय की एक मात्र परिभाषा और प्रगतिशीलों का विरोध है। धर्म इन सभी से इतर किसी तीसरे वर्ग के लिए बना है। और अब तक कायम भी है।
पीके जैसी फिल्मों को केवल एक आला मंच और अदद दर्शकों का तकाज़ा है। न ही किसी विवाद या समर्थन का। लेकिन ऐसी फिल्मों का असर वैसा होता नहीं दीखता जैसा प्रयोजन इनके निर्माण के पीछे रहा होगा। कहते हैं कि जिस किसी मुल्क में फुटबॉल विश्वकप का आयोजन हो रहा हो, उस मुल्क में अपराधों में तेजी से बढ़ोतरी देखने मिलती है। विश्वकप तो अपने समय पर खत्म हो जाता है पर लोगों की गर्मी कहां जाए? इस दौड़ती भागती दुनिया में, जहां श्रोताओं की कमी है। वक़्त की कमी है। जहां कोई किसी को सुनना-समझना नहीं चाहता। ऐसे में धार्मिक स्थल और करोड़ों देवी देवताओं की बड़ी भूमिका है लोगों को दिलासा देने की। वो कहते हैं न कि दिल सब समझता हो तो मुश्किल है जीना। जीना आसान बन जाए जब दिल को हम बुद्धू बनाना सीख जाएं। मंदिर मस्जिद ऐसे ही दिलासा देते संस्थान हैं।
दुनिया की समस्याओं का अंत करना नामुमकिन है। लेकिन विवेकपूर्ण ढंग से धर्म का विस्तार करना इतना बुरा भी तो नहीं। धर्म को विवेकपूर्ण ढंग से समझना धर्म में फैले बाबावाद और थैलीवाद को एक दिन समाप्त कर देगा पर धर्म पर ही अड़ंगा लगाना दुनिया को एक ऐसे पागलखाने में तब्दील कर देगा। जहां वक्ता ही वक्ता हों पर कोई श्रोता न हो। कोई सुनने वाला न मिले। ईश्वर और ईश्वर नाम से जुड़े संस्थानों का शुक्रिया जो दुनिया को खत्म होने से बचाय हुए हैं। आमिर खान का शुक्रिया जो ऐसे संस्थानों पर भक्तों को फिर से सोचने समझने और आँखे खोले रखने पर गाहे बगाहे चिकोटी काटते रहते हैं।
Sunday, 4 January 2015
फ़िल्म समीक्षा: पीके
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