Sunday, 28 December 2014

नेता एजेंडा और अभिनेता पटकथा का गुलाम होता है

नेता और अभिनेता में केवल 'अभि' का फ़र्क है। अभि का मान ज़रूर शून्य रहा होगा। जो नेता है वो अच्छा अभिनेता होगा ही और जो अभिनेता है उसमे भी नेता वाले सारे गुर होने लाज़मी है। फ़िल्म ओ माइ गॉड में अभिनेता परेश रावल का किरदार भगवान पर मुक़दमा ठोक देता है। उसे मंदिरों में दूध चढ़ाने से परहेज़ है। आज वही परेश रावल अहमदाबाद से भाजपा सांसद हैं। कल को अगर भाजपा अपने प्रस्तावित राम मंदिर का निर्माण  करवाती है तो क्या परेश उसपर दुग्धाभिषेक और पूजन अर्चन और कीर्तन पर प्रतिबन्ध लगवा देंगे?
सोचने वाली बात है कि वे कल अभिनय कर रहे थे! या आज? या फिर कल करेंगे? नेता एजेंडे और अभिनेता पटकथा का गुलाम होता है। फ़िल्म में वो होगा कोई सुपर हीरो, करोड़ो मिलने पर आपकी बारात के आगे नाचता मिल जाएगा। नए साल के जश्न में रंग जमा देगा।
रही बात मंदिरों में व्याप्त पाखंड और दूध घी तेल और शहद की बर्बादी की, तो जी तो सभी का जलता है। हिन्दू धर्म से जुड़े सबसे बुरे अपवादों में से एक कि मनई को खाने को हो नहीं रहा, चढ़ाने चले हैं। लेकिन मुद्दा उठाकर कोई बुरा नहीं बनना चाहता। आमिर खान अगर ऐसी बहादुरी दिखाने का माद्दा रखते हैं तो यह काबिल ए तारीफ़ है। पर क्या मालूम कल किसी अगली फ़िल्म में कोई गालीबाज मवाली या धार्मिक पुजारी के किरदार में सामने आ जाएं। और कहने लगें कि देखो शिव जी दूध पी रहे है। शिवलिंग में दूध चढ़ाते जाओ, देखो अपने आप गायब होता जा रहा है। भगवान भोलेनाथ को दूध पिलाना सुख और शांति देता है, यह कोई अंधविश्वास न होकर विशुद्ध आध्यात्म है।

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