दोपहर में अच्छे खाने का ठीया ढूंढ निकालना बड़ी चुनौती थी। पिछले महीने समाधान मिला जब किसी नें ऑफिस से थोड़ी ही दूर २ नम्बर चौक पर किसी आहार सम्पदा नामक होटल का ज़िक्र किया। सोचा चलकर देखें। उस दिन अकेले ही चल दिए। मैंने खुद को एक बेहद साफ़ सुथरे होटल में पाया जहां बहुत ही कम लोग खाना खा रहे थे। अजब सी शांति थी। दीवारों में भगवान बुद्ध और ओशो रजनीश के सुन्दर चित्र लगे थे।
काउंटर में बैठे व्यक्ति से पूछा, जो संभवतः होटल का मालिक था कि क्या आप ओशो को मानते हैं? पर उसनें बड़े ही तल्ख़ लहजे में जवाब दिया- मैं मानता नहीं, जानता हूं। समझे?
मैंने हामी भरते हुए खाना शुरू किया ही था कि उसने बोलना शुरू कर दिया। बोलता गया बोलता गया... बोलता ही गया। पेंटिंग्स मैंने ही बनाई हैं, खाना मैं खुद बनाता हूं, बिस्लरी के पानी से बनाता हूं वगैरह। तब तक बोलता गया जब तक मैं खाना ख़त्म कर पैसे देने उसके काउंटर तक नहीं आ गया। मैंने पैसे देकर टंटा पटाया। लेकिन खाना बहुत ही अच्छा था। कम तेल घी वाला। तीखी दाल भी थी। केवल चालीस रूपए थाली।
सोच रहा था कि बकवास सुनते हुए स्वादिष्ट भोजन- सौदा बुरा नहीं। क्यों न मुंह बंद कर खाकर देखा जाए। अवॉइड किया जाए तो शायद यह भी चुप रहे। फिर मैं और मनजिंदर भाई साथ जाने लगे। वह भी इसका स्वभाव जानते हैं। रोज़ दोपहर का खाना यहीं होने लगा। मैं भी चुप और वह भी। बाकी बैठे लोग भी चुप्पए चाप खाते हैं, या कहें कि केवल वे ही लोग यहां आते हैं जो इसकी बकवास सहन कर सकने की स्थिति में हैं। होटल में केवल एक ही वेटर है- जो लगभग गूंगा है। कुछ भी नहीं कहता। रोटी लाओ, दाल और लाओ। ला देगा। लेकिन कुछ कहेगा नहीं।
लेकिन रोज़ कोई न कोई नया आदमी ऐसा आ ही जाता है जिससे वह उलझ पड़ता है।
आज दिल्ली तरफ का कोई हट्टा कट्टा आदमी खाना खाने आया। हम रोज़ की ही तरह कर्फ्यू के बीच अपना खाना ख़त्म कर ही रहे थे कि वो आदमी अंदर आया।
क्या चाहिए?
एक थाली देना
चालीस रूपए दीजिए
(उस आदमी ने चालीस रूपए निकाल कर दे दिए और हांथ धोने चला गया)
अरे वहां कहां जा रहे हो? आपको तो पार्सल चाहिए न? (शायद उसने सोचा कि इसे पार्सल चाहिए तभी पैसे पहले दे दिया होगा)
भाईसाहब मैंने कब कहा मुझे पार्सल चाहिए?
तो फिर पहले पैसे क्यों दिए?
अरे तो मैंने कोई गुनाह थोड़े कर दिया भाई
(बस इतने में वो आदमी बिगड़ गया)
मेरे दिमाग में जो सौफ्टवेयर लगा है उसने मुझे बताया कि आप बंदे शरीफ हो पर मैं गलत था। आप बन्दे तो बेवकूफ़ निकले(मालिक ने उस आदमी से कहा)
अब बात बिगड़ गई थी। कुछ लोगों नें इशारों ही इशारों में कहा कि मत उलझो। चुपचाप ठूँसो और टरो यहां से।
मामला शांत हुआ। वो खाना खाने लगा।
थोड़े देर में वो फिर शुरू हो गया... पर भाई साहब आपको पहले पैसे नहीं देने थे
आप अभी तक भूले नहीं? कब तक सुनाओगे यार?
हम दोनों की हंसी नहीं रुक रही थी। पैसे देकर जैसे बाहर निकले उसका वेटर बाहर मिल गया। मैंने बगैर किसी जवाब की अपेक्षा किए पूछा- झेलते कैसे हो उसको? वो तब भी चुप था। और हमारी हंसी नहीं रुक रही थी। दूर से देखा तो वो दिल्ली वाला आदमी काउंटर में पैसे कटा रहा था। होटल मालिक का मुंह अब भी चलता दिख रहा था।
Saturday, 27 December 2014
आहार सम्पदा
Location:
Sachin INA, Sachin INA
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