भाइसाब, मेरे साथ लेडीज़ हैं! थोड़ी सी जगह मिल जाएगी क्या? हमारा वेटिंग
है। हमनें फरीदाबाद तक जाना है। पास खड़ी किसी महिला की तरफ इशारा करता
एक-दो कम तीस वर्षीय लगने वाला युवक मेरे पास आकर बोला। बगल बैठा सरदार
उन्हें देख आनाकानी करता हुआ मुंह फुला लिया। ट्रेन अंधेरी स्टेशन छोड़ी ही
थी। हम बांद्रा-अमृतसर एक्सप्रेस में साइड लोअर बर्थ में बैठे थे जिसमें
तीन लोग आसानी से बैठ सकते थे।सबको जाना है यार.. देदो जगह.. लेडीज़ हैं। मैंने सरदारजी को समझाते हुए कहा। महिला मेरे बगल में बैठ गई। बातें शुरु हुईं...
आप मुंबई रहती हैं?, मैंने पूछा।
हां अब तक
अब तक क्यों?
अबतक इसलिए क्योंकि आसानी से चल जाता था। मेरा ससुराल फरीदाबाद में है। इनकी मां बहुत बीमार रहने लगीं तो खर्चे बढ़ गए। आप तो जानते ही हैं, मुंबई जैसे शहर में पंद्रह हज़ार पे चलाना कितना मुश्किल है। ये वहीँ कहीं दिल्ली के आसपास नौकरी ढूंढ लेंगे।
क्या करते हैं आपके हसबैंड?
अकाउंटैंट हैं
प्राइवेट जॉब है?
जी
क्या नाम है आपका?
शालिनी
और इनका?
राहुल.. राहुल शर्मा
मैं प्रियम तिवारी
ओके। हमारा सामान काफी रखा हुआ है। टीटी कहीं ज्यादा पैसे न मांग बैठे। मैंने दरवाज़े के पास कोने में रखे दो तीन भारी बैग, बर्तन के बोरे और एक काले बैग पर नज़र दौड़ाई। हां वह लैपटाप वाला काला बैग ज़रूर राहुल का ऑफिस बैग होगा। जिसमें अब गृहस्थी का सामान ठूंसा हुआ था।
राहुल दरवाज़े के पास अखबार पे चादर बिछाए बैठा था।
मेरे मन में बार बार गृहस्थी शब्द कौंध रहा था। कितनी मुश्किल से जुडती है
यह गृहस्थी। हमारे माता पिता नें भला किस तरह जोड़ा होगा इसे?
सूरत आने पर मैंने दोनों को उनके जीवन की नई शुरुआत की शुभकामनाएं दीं। घर पहुंचा तो न्यूज़ चैनल एंकर मुंबई और अन्य महानगरों में मतदान के घटते प्रतिशत को लेकर चिंतित थे। ये दोनों भी तो मुंबई के ही वोटर होंगे?
यह सच है कि, आम आदमी हर बार की तरह इस बार भी, मतदान करने से चूक गया। किसी हवा लहर या परिवर्तन का हिस्सा न बन सका। वह रोटी की दौड़ दौड़ रहा था। शहर बदलते सपने टटोल रहा था।
दिल्ली का क्या, जिसकी होनी है .. सोलह को उसकी हो ही जाएगी। पर जो भी आएगा, उसके ज़िम्मे भारत का निराश मध्यमवर्ग है। जो आशा भरी निगाहों से टकटकी लगाय उसे देख रहा है।
सूरत आने पर मैंने दोनों को उनके जीवन की नई शुरुआत की शुभकामनाएं दीं। घर पहुंचा तो न्यूज़ चैनल एंकर मुंबई और अन्य महानगरों में मतदान के घटते प्रतिशत को लेकर चिंतित थे। ये दोनों भी तो मुंबई के ही वोटर होंगे?
यह सच है कि, आम आदमी हर बार की तरह इस बार भी, मतदान करने से चूक गया। किसी हवा लहर या परिवर्तन का हिस्सा न बन सका। वह रोटी की दौड़ दौड़ रहा था। शहर बदलते सपने टटोल रहा था।
दिल्ली का क्या, जिसकी होनी है .. सोलह को उसकी हो ही जाएगी। पर जो भी आएगा, उसके ज़िम्मे भारत का निराश मध्यमवर्ग है। जो आशा भरी निगाहों से टकटकी लगाय उसे देख रहा है।
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