Tuesday, 21 October 2014

टिफिन सेंटर


उस नकचढ़ी काठियावाड़ी टिफिनवाली नें मुझे हफ़्तों पहले निकाल दिया, जैसे दाल से हम हरी मिर्च निकाल फेंकें, कि टिफिन लो तो रेगुलर लो। मैं उसका शहद सा मीठा मीठा खाना रोज़ नहीं खा सकता था। सो, बात यहीं ख़त्म। हफ्ते भर से होटल का खाना खाय। शनिवार को बंटू पानीवाले को मैंने पकड़ा, बोला अबे यार कोई साफ़ सुथरा टिफिन सेंटर बताओ। बंटू नें कहा सामने जो पानवाला है, उसकी घरवाली टिफिन देती है। मैंनें नाक भौं सिकोड़ी .. पानवाला? अरे साफ सुथरा चाहिए यार। बंटू बोला बात करता हूं उससे। तुम मिल लेना बस एकबार। मैंने हामी भरी। ठीक है देखते हैं।
शनिवार को मैं ऑफिस से लौट रहा था। पीछे से किसी बुज़ुर्ग महिला की आवाज़ आई
तिवारी जी आपी हो ना?
जी
आपको टिफिन चाहिए न ?
जी चाहिए तो था। आपको कैसे मालूम ?
वो पानीवाले भइया नें हम लोगों को बताया था। मैं और मेरे पति यहीं सामने पान की दुकान लगाते हैं। हमारा पीछे बस्ती में घर है। आप कहो तो आज से लड़के के साथ भेज दूं आपका टिफिन। साठ रुपए एक टाइम का।
मैं उसके चेहरे की झुर्रियों की तरफ गौर से देख रहा था। वो दाल चावल सब्ज़ी और रोटी के साथ पापड सलाद बड़े आहिस्ता आहिस्ता गिना रही थी। मानो उसके लिए उन पापड और सलाद में अतिरिक्त मायने छिपे थे।
आपके पास टिफिन तो होगा? (मैंने पूछा)
नहीं। फिर कैसे करेंगे ?
मेरे पास भी नहीं है
आप कितने बजे खाते हैं ?
नौ-सवा नौ
हम भी। आप हमारे साथ ही खा लो न।
ठीक है। (मैंने जल्दबाजी में हामी भर दी थी। वजह टिफिन का न होना थी)
पर ..
पर क्या?
हम लोग मराठा हैं। हमारे यहां खा तो लोगे न आप ?
मैं ठीक नौ बजे मिलता हूं।
(उसके बताए पते पर मैं सवा नौ बजे पहुंचा)
उसने खाना लगाया। ठीक ठाक। ख़ास बात यह रही कि उन सभी व्यंजनों में कुछ मीठा बिलकुल भी नहीं था।
आप लोग क्या करते हैं ? मतलब पान दुकान के अलावा ?
मैं और मेरे पति हैं, साथ में बहु और पोता है। (उसनें किचन में रोटी सेंक रही महिला की तरफ इशारा करते हुए कहा)
और आपके बेटे?
वो तीन महीने पहले मर गया
कैसे ?
कैंसर था ?
तम्बाखू बीडी वगैरह ?
नहीं। लौंग तक नहीं खाता था। फिर भी। दुकान से खर्चा चल जाता है। बहु धागा तोडती है।
धागा तोडना मतलब ?
सूरत में जो साड़ियाँ बनती हैं। उसमें जो एक्स्ट्रा धागा लगा रहता है उसे तोडना पड़ता है। बीस पैसे मिलते हैं एक साड़ी के।
हम आपको दीवाली पर कुछ स्पेशल नहीं खिला पाएंगे। अभी हमारे यहां गमी हुई है न तो साल भर ...
चलेगा
मैंने कुछ पैसे एडवांस देने चाहे तो उसनें मना कर दिया। बोले कि रोज़ की रोज़ पेमेंट कर देना। चलेगा।
जाते जाते कई चीजें घूम रहीं थीं। गुजरात में खाना तीखा भी मिल सकता है। पानवाले के यहां अच्छा खाना नहीं मिलेगा, ईश्वर ऐसी घटिया सोच के लिए मुझे माफ़ करना। कैंसर, तुम बहुत बुरी चीज़ हो। तुमपे लानत, तुम देखते ही देखते कइयों को मार डालती हो। तुम्हारा सत्यानाश हो।

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