दिल्ली विधानसभा में टिकट न मिल सकने की वजह से निराश नेता और उनके समर्थक कार्यकर्ता इस्तीफ़े पर इस्तीफ़ा दिए जा रहे हैं। झंडे बैनर और आम सभाओं के बीच टिकट न मिल पाना कोप भवन निर्मित कर देता है। पर यह निराशा नहीं, निरा अहंकार है। राजनीति और अहंकार का चोली दामन का साथ है। टिकट पाने की चाह अहंकार जगाती है। पद पा लेने के बाद अहंकार बढ़ जाता है और टिकट न मिल सकने की सूरत में अहंकार हावी हो जाता है, इस्तीफ़े तक पहुंच जाता है। ऐसे नेताओं के समर्थक भी अपने अहंकार के प्रति सजग रहते हैं। उनके साथ खिंचाई तस्वीर घर के पहले कमरे में टंगी मिलती है। यह समर्थकों का अहंकार है। सत्ता के मद और अहंकार में चूर नेता ही अक्सर उलूल जुलूल बयाबाजी करते हैं। मैं पिछले कई सालों पूर्व गुजरात दंगों से इतर, नरेंद्र मोदी की कार्यशैली से खासा प्रभावित था। पर जब मोदी को दो बार करीब से देखने मौका मिला। उनकी चलने के तरीका, बात करने का सुर(आठवां सुर) उनके हद से अधिक अहंकारी होने का सबूत देता है। गोवा अधिवेशन के दौरान संजय जोशी के ख़िलाफ़ मोदी का यह रवैया 'कि उससे पहले इस्तीफ़ा लो, तभी मैं अधिवेशन में हिस्सा लूंगा', इसका और भी पुख्ता सबूत देता है। समझ से परे है कि प्रधानमंत्री की ऐसी अकड़ को लोग भारत के गौरव से जोड़ कर भला कैसे देख लेते हैं। किरण बेदी के एकाएक भाजपा से जुड़ने और मुख्यमंत्री दावेदारी हथिया लेने से मौजूदा संभावितों का अहंकार भी साफ़ पता पड़ता है। लोगों का ईगो हर्ट हो गया।
"आज वो काबिल हुए जो कभी काबिल न थे। मंज़िलें उनको मिलीं, जो दौड़ में शामिल न थे।"
नेताओं के चेहरे लटक गए। पेट में मरोड़ पड़ने लगे। कांग्रेसी नेताओं को अपनी ज़मीन खिसकती मालूम हुई तो पाला बदल दिया। हारेंगे नहीं, भले ही पार्टी बदल लें। वही भाजपा, जो कल तक अछूत थी। आज अपनी लगने लगी। आज उसी की बदौलत चुनाव जीत लेंगे। बस कुर्सी का अहंकार बना रहे। टूटने न पाए। बागी हो भी गए तो क्या।
ऐसी राजनीति, चाहे जिस किसी भी दल की हो। विकास से उसका कोई ताल्लुक होना असंभव है। ऐसे आभा मंडल से निकला व्यक्ति चुनाव जीतने के बाद आम आदमी से क्या सरोकार रखेगा, जनता से कैसा संपर्क स्थापित हो सकेगा, इसमें संशय है। राजनीति को भ्रष्टाचार से अधिक नेताओं के अहम् से खतरा है। और ऐसी राजनीती से समाज को भी।
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