'माय च्वाइस' जैसे मुद्दों पर चर्चाओं का बाज़ार गर्म है। इसे पूर्व में दीपिका पादुकोण पर फिल्माए गए छैल-छबीले नृत्यों से भी जोड़कर देखना सही नहीं है। वे डायरेक्टर च्वाइस थे, और आज जो वे कह रही हैं- वे दीपिका की च्वाइस है। अगर उन फिल्मी नृत्यों पर भी दीपिका की च्वाइस बरकरार रहती तो क्या वे बोल्ड एंड ग्लैमरस दीपिका पादुकोण कहला पातीं? बहरहाल। माय च्वाइस के साथ साथ चर्चा महिलाओं के अंतर्वस्त्रों पर भी खुलकर होने लगी है। कम से कम मुझे तो इसपर किसी को बोलता देख भी शर्म आ जाती है। विषय भी क्या- ब्रा ? संभव है कुछ लोग इसपर खुलकर चर्चा कर सकते हों, उन्हें इजाज़त मिलनी चाहिए। उन्हें ब्रा पर खुलकर बहस में हिस्सा लेना ही चाहिए। आप उन्हें भला कब तक और रोक सकेंगे ? गलती मर्दों की ही है, हमनें न जाने किस डर से, पर समाज को रोककर रखा।
औरतें आज आर्थिक और सामजिक रूप से मर्दों को टक्कर दे रही हैं। उनके हांथ में तालीम है, उन्होंने इतिहास से वो सब कुछ जाना, जो हमारे यहाँ होता रहा। आज ठीक उसी तरह, वो आपसे बातें करना चाहती हैं। इसीलिए दीपिका का कहा जायज़ है कि, किसी भी महिला को पूरी आज़ादी है, विवाहपूर्व या विवाहोत्तर, असीमित मर्दों के साथ शारीरिक संबंध बनाने की। पर पहले पुरुषों से विवाहोत्तर संबंध निभाने की ज़िद खत्म करनी होगी। पहले यह भी तय कीजिए कि पति, बच्चों और सास ससुर को लेकर आपकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं होगी। कुल मिलाकर, परिवार प्रणाली ख़त्म कर दीजिए। फिर आपको पूरी आज़ादी है। चाहे जो करने की, असंख्य शारीरिक संबंध बनाने की। और मन मुआफिक साथी बदलने की भी। और फिर भी अगर कोई समाज आपको रोके तो वो समाज बुज़दिल है। कोई मर्द ऐसा करने से रोके तो वो भी नामर्द है। पर पहले तय तो आपको करना होगा। आखिर हम इतने बुरे जो ठहरे।
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