Monday, 2 February 2015

जै बोलो जै रेल माता की जै

बेशक रेल माता की जै। आज़ादी के बाद से निरंतर हमारी अर्थव्यवस्था का लालन पालन करने वाली रेल मइया ही तो है। इसपर शब्द कम पड़ जाएं कि रेलवे हमारे जीवन में कितना अहमियत रखती है। कभी न मिलने वाली पटरियां कितना कुछ जोड़ देती हैं। फिर भी हैरत होती है, जब प्रत्येक वर्ष के रेल बजट में माननीय मंत्री मेज़ की थपथपाहट के साथ रेलवे के घाटे से जूझने की बात स्वीकारते हैं। मेरे जैसे करोड़ों रेल उपभोक्ताओं के ज़हन में सवाल उठना लाज़मी है कि आखिर रेलवे घाटे में क्यों है? सत्तर सालों में हम केवल योजनाओं, सुधारों और क्रियान्वयन की दिशा में ही बढे हैं, फिर रेलवे इससे अछूता कैसे रह गया? क्या कमी रह गई?
भारतीय रेल राष्ट्र की एकमात्र ऐसी संपत्ति है जो आपको ऐसा महसूस भी कराती है। जनता के द्वारा जनता के लिए चलाई गई एकमात्र सुविधा जिसमें सेवा सुरक्षा और संतुष्टि के भरसक प्रयास किए गए हों। राजस्व जुटाया गया हो। साथ ही संगठित और असंगठित क्षेत्रों के लाखों लोगों को रोजगार भी मिला हो। इतना कुछ होने के बावजूद भी रेलवे के खस्ताहाल क्यों हैं? जी जलता है।
बतौर रेल उपभोक्ता, रेलवे को लेकर बचपन से अब तक, जैसा मेरा अनुभव रहा। वो यह कि रेल रेल में कभी न बैठने वालों द्वारा चलाई गई। उस कार्यक्रम की समीक्षा भी हवाइज़ादों नें ही की। और तो और रेल जैसी दुधारू गाय गठबंधन धर्म के पालन में दान कर दी गई। उसके अलावा रेलवे प्रबंधन को दी गई अतिस्वायत्ता इसका गला दबा देती है।
वाकई रेलवे में सुधारों की हद दरकार है पर वे तमाम सुधार तो रेलवे में स्वयं मौजूद हैं। इसके लिए किसी पीपीपी मॉडल की दरकार(हाइ लेवल एक्सक्यूज़) नहीं है।
पहला, तो यह कि रेल प्रबंधन के साथ साथ रेल उपभोक्ता भी अपनी जवाबदेही तय करें। वे प्राइवेट बसों तक तो उपभोक्ता बने रहते हैं। रेल में बैठते ही दामाद हो जाते हैं। ऐसा नहीं है कि वे सफाई नापंसद हों पर रेलवे के सफाई के प्रति ढुलमुल रवैये के चलते रेलवे की छवि भी हद से अधिक सहज बनी हुई है। जो करना हो कीजिए। कौन देखता है। ठीक वैसी ही स्थिति टिकट खरीदने को लेकर है। आधे से अधिक आबादी बगैर टिकट यात्रा करती है। जनरल बोगियों में तो न टीटी आते हैं न ही लोग टिकट खरीदते हैं। ऐसे हाल में मुनाफा तो दूर, लागत निकलना भी मुश्किल हो जाता है।
दूसरा, सबसे अहम बिंदु है कि रेल किराए के पैमाने में सुधार। आप लोगों को समझा सकने में ही असफल रहे कि रेलवे लूटने के लिए नहीं, बल्कि लागत निकालने के लिए किराया बढ़ोतरी करता है। ऐसी मुफ्तखोरी कब तक चलेगी? जलगांव से भुसावल जाने के लिए सरकारी बस का भाड़ा पचास रूपए है और पैसेंजर ट्रेन का पंद्रह रूपए! क्या यह किसी मुफ़्त खोरी से कम है? उसी रेल में जहाँ चाय दस रूपए और पानी बीस रूपए में बिकता है। उन दामों से कतई परहेज नहीं पर रेल किराए के वो दो रूपए विशुद्ध लूट हैं। सरकार आज स्पष्ट बहुमत और सख्त(कागज़ी) इरादों के साथ संसद में अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा रही है। देश के रेल मंत्री स्वयं एक चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं। सरकार को इतनी हिम्मत तो दिखानी ही होगी कि रेल के किराए सही दिशा में बढ़ा सके। और मुफ्तखोरों को सीधा सन्देश दे सके। सही माल गुज़ारी और किराए के सही मानक रेलवे को स्वावलंबी बनाएंगे। पैसेंजर से सुपरफास्ट कर देंगे। हमें बाहरी निवेश की ज़रूरत कम पड़ेगी।
तीसरा, यह कि रेलवे समझे कि रेल न ही कोई उच्चस्तरीय रेस्त्रां है और न ही कोई फाइव स्टार होटल। उसे इस मुग़ालते से अब बाहर आ जाना चाहिए। एक बड़ा तबका आज भी सफ़र के दो वक़्त का खाना साथ लेकर चलता है। रेल के खाने का उतना ज्यादा स्वादिष्ट या पौष्टिक होने में उसे कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता। बेहतर खाने की सुविधाओं के चलते दाम ज़रूर बढ़ जाते हैं। पर खाना वही जस का तस। खाने पर नई पर नई पहल करने से बचना होगा। पेंट्री कार के ट्रेन पर से एकाधिकार को समाप्त कर स्टेशनों और स्टेशनों से लगे व्यावसायिक होटलों को तरज़ीह दी जा सकती है। इससे सीधी प्रतिस्पर्धा तो बढ़ेगी ही। गुणवत्ता का फायदा यात्रियों तक पहुंचेगा सो अलग।
चौथा, यह कि रेल कर्मचारियों का उनके कार्य के आधार पर विभाजन। जैसे कि आरपीएफ सीधे टीटी को रिपोर्ट करे। स्लीपर में भी अटेंडर नियुक्त हों जो डब्बे की समुचित साफ़ सफाई के प्रति जवाबदेह हों। इससे डब्बों में सुरक्षा बढ़ेगी और साफ सफाई में भी पारदर्शिता आएगी।
पांचवा, और सबसे अहम् बिंदु है सीट को लेकर। जनरल से लेकर एसी कोचों तक में सीट की अनुपलब्धता एक बड़ी समस्या है। किराया बढ़ाए जाने की बजाय किराया लेकर भी सीट उपलब्ध न कराना लूट जरूर है। इसका हल रेलवे हर साल ट्रेनों में बढ़ोतरी कर के निकालना चाहता है। असफल रहता है। उन प्रस्तावित ट्रेनों में से कितनी ट्रेनें चल पाती हैं? स्वयं रेल मंत्री भी इससे अनिभिज्ञ होंगे। हम ट्रेन में डब्बे बढ़ाने पर जोर क्यों नहीं देते? बढ़ती आबादी के साथ क्या यह ज़रूरी नहीं कि ट्रेनों में जनरल के डब्बे चार से आठ हों? स्लीपर और एसी डब्बों की संख्या में बढ़ोतरी हो? हम बुलेट ट्रेन के सपने पर बेवजह खर्च करने की बजाय हाईटेक इंजनों के निर्माण पर खर्च क्यों नहीं करते? जो तीस तीस डब्बे आसानी से खींच सकें। फर्राटा दौड़ सकें।
छटवां, यह कि रेलवे को कुछ बचकानी परंपराएं अब तोड़ देनी चाहिए। जैसे कि प्रत्येक प्लेटफॉर्म में टिकट खिड़की हो। रेल नीर जैसे बेवजह के निवेश बंद हों। रेलवे का काम ट्रेन चलाना है न कि पानी बेचना। छोटे से छोटे स्टेशनों पर भी यात्री विश्रामगृह को होटलों की तर्ज़ पर निर्मित करना। मौजूदा व्यवस्था में महिला यात्री साथ न होने पर कमरा नहीं दिया जाता। आपको अकेले डॉरमेट्री में पड़ा रहना पड़ता है। अपडाउनर्स को लेकर अलग खाका तैयार किया जाए, उनके लिए अलग बोगी हो। आरपीएफ और जीआरपी का एकीकरण और सुरक्षा जैसे गंभीर मसलों पर हमें और भी आगे जाना है।
सातवां, यह कि, निजीकरण हल न होकर केवल जिम्मेदारियों से बचना है। सरकार मूलभूत ज़रूरतों से पर्दा करके निजी निजी का राग पिछले दस सालों से अपना ज़रूर रही है। सफाई और भोजन का हमने निजीकरण किया। नतीजा सामने है।
आठवां, यह कि हम कोटावाद से बहार आएं। सैंकड़ों कोटे हैं जिनकी कोई ज़रूरत नहीं, जो रेलवे के लिए केवल घाटे का काम करते हैं। सांसद प्रतिनिधि और परिजनों का कोटा समाप्त हो। रेल कर्मचारियों का कोटा बंद हो। पद्म पुरुस्कार विजेताओं को दी जाने वाली सामंती रियायत बंद हो। उक्त सभी रेल किराए को देने में सक्षम होने के बावजूद बड़ी ऐंठ के साथ मुफ़्त सफ़र करते हैं।
नौंवा, और अंतिम यह कि पांच सालों के लिए सभी नए प्रोजेक्ट्स आने बंद हों। साथ ही पुराने प्रोजेक्ट्स पर समीक्षा भी हो। बेवजह के प्लान रोक दिए जाएं और बड़े बजट के साथ हम ज़रूरी प्रोजेक्ट्स पर आगे बढ़ें। हम फिलहाल बुलेट ट्रेन को भूलकर सामान्य कोचों में मूलभूत सुविधाएं विकसित करें। सिंगल ट्रैक को डबल और मीटर गेज़ को ब्रॉड गेज़ करने पर निवेश करें। साथ ही हम मालगुज़ारी को और आसान बनाने की ज़िद करें।
पुनश्च: इन सब सुझावों में सबसे बड़ी ज़रूरत है रेल किरायों में बाबा आदम में ज़माने के मानकों में सुधारों की। सरकार बेखौंफ होकर वाज़िब दाम वसूले। लोगों के दिमाग में जो मुफ़्तखोरी की आदत लग चुकी है, उससे उन्हें निजाद दिलाए। लोगों में यह सोच विकसित करें कि स्वाभाविक महंगाई का मुकाबला तो वे कुछ अतिरिक्त मेहनत के बल पर अपनी आय बढाकर तो कर ही सकते हैं। बहरहाल, इन सबको वक़्त के साथ अमल में आता देख मैं भारतीय रेल को तमाम विश्वस्तरीय सुविधाओं के बीच इठलाते हुए चलता देखता हूं। उसमें मेरा भारत सफ़र करता है। दिन को दूना और रात चौगुना भागता है। विकास के नए नए चकाचक स्टेशनों पर उतरता है।

No comments:

Post a Comment